Pandit Sundarlal Sharma: छत्तीसगढ़ के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जिन्होंने आजादी की लड़ाई के साथ समाज को बदलने का भी काम किया। पंडित सुंदरलाल शर्मा उन्हीं महान लोगों में शामिल थे। उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ आवाज उठाने के साथ छुआछूत, सामाजिक भेदभाव और अंधविश्वास के खिलाफ भी संघर्ष किया। यही वजह है कि उन्हें प्यार से ‘छत्तीसगढ़ का गांधी’ कहा जाता है।
पंडित सुंदरलाल शर्मा का जन्म 21 दिसंबर 1881 को महानदी के किनारे स्थित चंद्रसुर गांव में हुआ था। बचपन से ही उन्हें पढ़ने और लिखने में काफी रुचि थी। उन्होंने बिना किसी औपचारिक प्रशिक्षण के संस्कृत, हिंदी, बंगाली, मराठी, अंग्रेजी, उर्दू और उड़िया जैसी भाषाओं का ज्ञान हासिल किया।पंडित सुंदरलाल शर्मा ने कम उम्र में ही कविता, लेख और नाटक लिखना शुरू कर दिया था। वर्ष 1898 में उन्होंने पंडित विश्वनाथ दुबे के सहयोग से कवि समाज की स्थापना की। यह संस्था छत्तीसगढ़ में साहित्यिक जागरूकता फैलाने वाली शुरुआती संस्थाओं में गिनी जाती है।
अंग्रेजी सामान के खिलाफ खोला मोर्चा
आजादी की लड़ाई में पंडित सुंदरलाल शर्मा ने सिर्फ भाषण देने तक खुद को सीमित नहीं रखा। वर्ष 1903 में वे कांग्रेस से जुड़े और 1907 के सूरत अधिवेशन में छत्तीसगढ़ से जाने वाले युवाओं का नेतृत्व किया। इसके बाद उन्होंने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी सामान के इस्तेमाल का अभियान चलाया।पंडित सुंदरलाल शर्मा का मानना था कि जब तक लोग देश में बनी चीजों को नहीं अपनाएंगे, तब तक गांवों की आर्थिक हालत बेहतर नहीं होगी। इसी सोच के साथ उन्होंने अपनी जमीन-जायदाद तक बेच दी और राजिम, धमतरी तथा रायपुर में स्वदेशी वस्तुओं की दुकानें शुरू कीं। घाटा होने के बावजूद वे लंबे समय तक इन दुकानों को चलाते रहे।
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दलितों के अधिकार के लिए उठाई आवाज
समाज में छुआछूत के खिलाफ पंडित सुंदरलाल शर्मा का संघर्ष बेहद खास था। उनका मानना था कि दलितों को भी समाज में वही राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक अधिकार मिलने चाहिए जो दूसरे वर्गों को हासिल हैं।पंडित सुंदरलाल शर्मा गांव-गांव जाकर दलित समाज के बीच जागरूकता फैलाते थे। उन्होंने उन्हें सामाजिक बराबरी का भरोसा दिया। कई जगह उन्होंने दलितों से यज्ञ करवाया और उन्हें जनेऊ पहनाया। इसके साथ उनसे नशे और मांसाहार से दूर रहने की प्रतिज्ञा भी कराई जाती थी। उनका यह काम उस दौर में सामाजिक बदलाव की बड़ी पहल माना जाता था।
कंडेल सत्याग्रह से गांधी तक जुड़ा नाता
छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता आंदोलन में पंडित सुंदरलाल शर्मा की भूमिका कंडेल नहर सत्याग्रह से भी जुड़ी रही। वर्ष 1920 में कंडेल गांव में किसानों ने नहर से जुड़े मुद्दे को लेकर आंदोलन शुरू किया। इस आंदोलन ने पूरे क्षेत्र में अंग्रेजी शासन के खिलाफ माहौल तैयार किया।पंडित सुंदरलाल शर्मा के प्रयासों से 20 दिसंबर 1920 को महात्मा गांधी पहली बार छत्तीसगढ़ पहुंचे। गांधी ने रायपुर, धमतरी और कुरूद में लोगों को संबोधित किया। बाद में वर्ष 1933 में गांधी दोबारा छत्तीसगढ़ आए और पंडित सुंदरलाल शर्मा के सामाजिक कार्यों की सराहना की। गांधी ने उन्हें अपना अग्रज और गुरु जैसा सम्मान दिया।
हिंदू-मुस्लिम तनाव के बीच कराया समझौता
सामाजिक एकता के लिए भी पंडित सुंदरलाल शर्मा लगातार काम करते रहे। वर्ष 1925 में धमतरी में हिंदू-मुस्लिम तनाव की स्थिति पैदा हुई। उस समय उन्होंने दोनों पक्षों के बीच बातचीत कराकर विवाद को शांत कराने में भूमिका निभाई।पंडित सुंदरलाल शर्मा के इस प्रयास का दोनों समुदायों ने सम्मान किया। बताया जाता है कि धमतरी में बड़ी संख्या में हिंदू और मुस्लिम लोगों ने उनका सार्वजनिक अभिनंदन किया। उनके लिए देश की आजादी के साथ समाज की एकता भी उतनी ही जरूरी थी।
जंगल सत्याग्रह में जेल भी गए
अंग्रेजी शासन के खिलाफ पंडित सुंदरलाल शर्मा का संघर्ष लगातार जारी रहा। वर्ष 1930 में जंगल सत्याग्रह में भूमिका निभाने के कारण उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उन पर राजद्रोह का मामला चलाया गया और दो साल के कठोर कारावास की सजा दी गई।पंडित सुंदरलाल शर्मा कई बार जेल गए और अंग्रेजी शासन का दमन सहा, लेकिन उनके विचार और आंदोलन नहीं रुके। उनका मानना था कि सच के रास्ते पर चलते हुए डरने की जरूरत नहीं है।
साहित्य में भी छोड़ी अलग पहचान
आजादी और समाज सुधार के साथ पंडित सुंदरलाल शर्मा साहित्य से भी जुड़े रहे। उन्होंने हिंदी और छत्तीसगढ़ी में करीब 18 ग्रंथों की रचना की। उनके साहित्य में सामाजिक जीवन, धार्मिक विचार और लोक संस्कृति की झलक दिखाई देती है।पंडित सुंदरलाल शर्मा की चर्चित रचनाओं में प्रह्लाद चरित्र, करुणा पचीसी, प्रह्लाद पदावली, ध्रुव चरित्र और छत्तीसगढ़ी दानलीला जैसे नाम शामिल हैं। छत्तीसगढ़ी बोली को सम्मान दिलाने के उनके प्रयासों को भी विशेष रूप से याद किया जाता है।
28 दिसंबर 1940 को हुआ निधन
जीवन के अंतिम दौर में भी पंडित सुंदरलाल शर्मा पद और प्रतिष्ठा से दूर रहे। वे अपने गांव में खेती से जुड़े रहे और आधुनिक कृषि तरीकों को अपनाने पर जोर दिया। कृषि के क्षेत्र में उनके काम को शासन स्तर पर भी सम्मान मिला था।पंडित सुंदरलाल शर्मा का निधन 28 दिसंबर 1940 को हुआ। उन्होंने अपने पीछे केवल स्वतंत्रता आंदोलन की यादें नहीं छोड़ीं, बल्कि सामाजिक बराबरी, शिक्षा, स्वदेशी और हिंदू-मुस्लिम एकता का विचार भी छोड़ा। आज उन्हें ‘छत्तीसगढ़ के गांधी’ के रूप में याद किया जाता है। उनकी कहानी बताती है कि आजादी की लड़ाई सिर्फ अंग्रेजों के खिलाफ नहीं थी, बल्कि समाज के भीतर मौजूद भेदभाव को खत्म करने की लड़ाई भी थी।

