अंबिकापुर : छत्तीसगढ़ में धान खरीदी को लेकर सरकार की व्यवस्थाएं एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई हैं। सीतापुर स्थित केरजू धान खरीदी केंद्र के प्रबंधक दिनेश गुप्ता की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत ने पूरी व्यवस्था की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। आखिर ऐसा क्या दबाव था, जिसने एक जिम्मेदार अधिकारी को इतना बड़ा कदम उठाने पर मजबूर कर दिया?
क्या खरीदी केंद्रों पर काम कर रहे अधिकारी सुरक्षित हैं?
धान खरीदी को सरकार किसानों के हित में बताती है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट नजर आ रही है। खरीदी केंद्रों पर प्रबंधकों और कर्मचारियों पर लगातार टारगेट, भुगतान, रिकॉर्ड और लेन-देन का भारी दबाव रहता है। सवाल यह है कि क्या सरकार ने इन अधिकारियों के लिए कोई मानसिक या प्रशासनिक सुरक्षा व्यवस्था बनाई है?
लेन-देन और जवाबदेही का बोझ किसका?
सूत्रों के मुताबिक, मृतक प्रबंधक पैसों के लेन-देन और हिसाब-किताब को लेकर तनाव में थे। यदि यह सच है, तो यह सीधे-सीधे धान खरीदी सिस्टम में मौजूद खामियों की ओर इशारा करता है। क्या हर गड़बड़ी की जिम्मेदारी सिर्फ निचले स्तर के कर्मचारियों पर डाल दी जाती है? क्या बड़े अधिकारी और नीति निर्माता जवाबदेह नहीं हैं?
पहले भी सामने आ चुके हैं मामले
यह पहला मामला नहीं है जब धान खरीदी से जुड़े किसी अधिकारी या कर्मचारी पर मानसिक दबाव की बात सामने आई हो। इससे पहले भी प्रदेश के कई जिलों से निलंबन, एफआईआर और आत्महत्या जैसे मामले सामने आ चुके हैं, लेकिन सरकार ने कभी ठोस सुधारात्मक कदम नहीं उठाए।
जांच सिर्फ मौत तक सीमित क्यों?
अब सवाल यह भी उठता है कि क्या जांच सिर्फ आत्महत्या के कारण तक सीमित रहेगी या पूरी धान खरीदी व्यवस्था की ऑडिट और जवाबदेही तय की जाएगी? यदि सिस्टम की खामियां उजागर नहीं हुईं, तो ऐसे हादसे आगे भी दोहराए जा सकते हैं।











