भोपाल। MP Politics : मध्य प्रदेश में जिस समय बीजेपी की नई कार्यकारिणी के साथ मंत्रिमण्डल विस्तार की अटकलें उछालें मार रही हैं. उस समय में एक रिपोर्ट ने बीजेपी संगठन के सामने नया सवाल खड़ा कर दिया है. सवाल यह है कि लंबे समय से हाशिए पर जमीनी कार्यकर्ता को मौका मिलेगा या सत्ता की चाबी फिर एक बार परिवार में ही ट्रांसफर हो जाएगी.
MP Politics : एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफार्म की ताजा रिपोर्ट बता रही है कि कांग्रेस के मुकाबले में बीजेपी में पिता से बेटे-बेटियों, चाचा से भतीजे, पति से पत्नी और ससुर से बहू के हाथों में सत्ता देने के मामलों की कतार लंबी है. जिनकी बदौलत एमपी देश के टॉप टेन राज्यों में 6वें नंबर है. मध्य प्रदेश के 270 जनप्रतिनिधियों में से 57 ऐसे जनप्रतिनिधि हैं, जिन्हें राजनीति थाली में परोस कर मिली है.
सियासी बयानों में राजनीतिक दल भले एक दूसरे को परिवारवाद से परे बताते रहें, लेकिन परिवारवाद का पोषण करने वाले राज्यों की सूची में मध्य प्रदेश टॉप टेन राज्यों में शामिल है. उत्तर भारत के राज्यों में एमपी, उत्तर प्रदेश और बिहार के बाद 6वें नंबर पर आता है. मध्य प्रदेश के 270 जनप्रतिनिधियों में से 57 यानि 21 फीसदी को राजनीति परिवार से विरासत में मिली. ससुर-बहू, बाप-बेटा, चाचा-भतीजा और पिता बेटी से लेकर पति के बाद पत्नी जैसे सांसद से लेकर विधायक तक दर्जनों उदाहरण हैं.
खास बात ये है कि कांग्रेस के मुकाबले कैडर बेस्ड पार्टी बीजेपी में परिवार से सत्ता का टिकट लेकर आगे बढ़े नेताओं की कतार लंबी है. सांसद और विधायक मिलाकर बीजेपी में ये आंकड़ा 35 है. जबकि कांग्रेस में केवल 22 नेता ऐसे हैं, जिन्होंने परिवार के प्लेटफार्म पर राजनीति की उड़ान भरी है. मध्य प्रदेश के 270 जनप्रतिनिधियों में से 57 ऐसे हैं. जो परिवार का जैक लिए हुए ही पॉलीटिक्स में आए हैं.
परिवार के बूते टेक ऑफ करने वाली महिला नेत्रियों का प्रतिशत ज्यादा
एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफार्म की इस रिपोर्ट में पुरुष और महिला के अंतर से भी परिवार के जरिए राजनीति में आने वालों का अंतर बताया गया है. एमपी में 234 जनप्रतिनिधियों की अगर बात करें, तो इनमें से 38 जनप्रतिनिधि पुरुष वर्ग से आते हैं. जो कि 16 प्रतिशत हैं. जबकि कुल जमा 36 महिला जनप्रतिनिधियों में देखें तो परिवार की बदौलत राजनीति में जमीन पाने वाली महिलाएं 19 हैं. इनका प्रतिशत 53 है, जो कि पुरुष जनप्रतिनिधियों का तकरीबन तीन गुना है. कांग्रेस और बीजेपी दोनों दलों की मिलाकर देखें तो, ये महिलाएं हैं, जिन्हें राजनीति की जमीन और आसमान पार्टी से पहले परिवार ने दिया.
बीजेपी में परिवार की बदौलत बढ़ी यें महिला नेत्रियां
भारती पारधी
बालाघाट से बीजेपी की सांसद चुनी गईं भारती पारधी को बहू बनने के बाद राजनीति में जमीन से आसमान मिला. उनके ससुर भोलाराम पारधी 1962 में बालाघाट से सांसद रहे थे. तब वे प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का नेतृत्व कर रहे थे. अब पति खीरसागर पारधी भी अभीजिला पंचायत के सदस्य हैं.
अनिता नागर सिंह चौहान
रतलाम के आरक्षित सीट से सांसद बनीं अनिता के पति नागर सिंह चौहान 2003 से 2018 और फिर 2023 से 2028 के कार्यकाल में विधायक और पूर्व मंत्री हैं.
लता वानखेड़े
सागर लोकसभा सीट की सांसद लता वानखेड़े के पति नंदकिशोर उर्फ गुड्डू वानखेड़े की राजनीति में पकड़ की बदौलत 2000 में लता वानखेड़े सियासत में पैर जमा पाईं. फिर बीजेपी से लोकसभा उम्मीदवार बनने के बाद सांसद के ओहदे तक पहुंची.
हिमाद्री सिंह
शहडोल में आरक्षित सीट से सांसद चुनी गईं हिमाद्री सिंह के पिता दलबीर सिंह 1980-84 और फिर 191 में कांग्रेस से सांसद रहे. इसके अलावा दो बार केन्द्रीय मंत्री भी रहे. इन्हें भी राजनीति तश्तरी में सजा कर मिली है.
कविता पाटीदार
राज्यसभा की सांसद कविता पाटीदार भी राजनीतिक परिवार से आती हैं. उनके पिता भैरूंलाल पाटीदार महू विधानसभा सीट से 1973, 1985-1990 और फिर 1993 में विधायक रहे. 1993 से 1998 तक मध्य प्रदेश विधानसभा में उपसभापति भी रहे. यहां भी पिता की राजनीतिक विरासत को बेटी ने आगे बढ़ाया.
पिता, पति और ससुर के बनाए प्लेटफार्म पर खड़ीं ये विधायक
कृष्णा गौर
भोपाल की गोविंदपुरा सीट से विधायक कृष्णा गौर के ससुर बाबूलाल गौर ने जिस विधानसभा पर जीत का रिकार्ड बनाया, अब वो सीट विरासत में उनकी बहू कृष्णा को मिली है.
सरला विजेन्द्र रावत
कमोबेश ससुर के सियासी दम का फायदा मुरैना के सबलगढ़ से विधायक सरला विजेन्द्र रावत को भी मिला. इनके ससुर मेहरबान सिंह रावत भी बीजेपी से ही विधायक का चुनाव जीते थे.
प्रतिमा बागरी
मध्य प्रदेश सरकार में राज्य मंत्री के रुतबे तक पहुंची सतना के रैगांव सीट से विधायक प्रतीमा बागरी के माता-पिता का राजनीति बैकग्राउण्ड है. पिता जयप्रताप और मां कमलेश दोनों सतना जिला पंचायत के सदस्य रहे.
राधा सिंह
मध्य प्रदेश सरकार में राज्य मंत्री राधा सिंह के ससुर की बनाई जमीन अब बहू के काम आ रही है. ससुर जगन्नाथ सिंह देवास सीट से तीन बार एमएलए चुने गए और सीधी से सांसद का चुनाव जीते हैं.
अर्चना चिटनिस
बुरहानपुर सीट से चुनाव जीती पूर्व मंत्री और विधायक अर्चना चिटनिस के पिता ब्रमोहन मिश्रा 1977 में विधायक बन गए थे. इसके बाद 1990 से 1993 के दौरान वे सदन के स्पीकर की भूमिका में भी रहे.
मंजू राजेन्द्र दादू
नेपानगर से विधायक बनी मंजू राजेन्द्र दादू अपने नाम के साथ पिता का नाम लगाती हैं. पहचान भी उन्हीं की दी हुई है. पिता की बनाई पॉलीटिकल पिच पर उतरी हैं. उनके पिता राजेन्द्र श्यामलाल दादू नेपानगर से 2008 फिर 2013 के विधानसभा चुनाव में विधायक रहे.
गायत्री राजे
राजघरानों में जिस तरह राजनीति का हस्तातरण हुआ, उसमें सिंधिया परिवार के बाद देवास के पवार भी हैं. यहां से विधायक गायत्री राजे के पति तुकोजीराव की तूती देवास में बोलती थी. वे 6 बार के विधायक व मंत्री थे. अब उनके निधन के बाद उनकी पत्नी राजनीति संभाल रही हैं.
नीना वर्मा
परिवार में ही बना रहा धार. धार सीट से विधायक नीना वर्मा के पति विक्रम वर्मा तो नेता प्रतिपक्ष भी रहे, सरकार में मंत्री भी केंद्रीय मंत्री भी. विक्रम वर्मा की राजनीतिक विरासत को उनकी पत्नी नीना वर्मा संभाले हैं.
मालिनी गौड़
इंदौर की चार नंबर विधानसभा सीट पर कभी लक्ष्मण सिंह गौड़ का डंका बजता था. 15 साल लगातार विधायक रहे. फिर एक दुर्घटना में निधन के बाद अब उनकी पत्नी मालिनी गौड़ सहानुभूति की लहर पर सवार होकर सियासत में आईं.
निर्मला भूरिया
झाबुआ के पेटलावद से विधायक निर्मला भूरिया को संस्कारों के साथ सियासत भी मिली. दिलीप सिंह भूरिया रतलाम सीट से सांसद चुने गए. अब उनकी बेटी झाबुआ के पेटलावद से विधायक भी हैं और सरकार में मंत्री भी.
गंगा सज्जन उइके
गंगा उइके अपने नाम के साथ साथ अपने पति सज्जन उइके का भी नाम लगाती हैं. वजह ये है कि घोड़ाडोंगरी से वधायक गंगा के पति सज्जन उइके बीजेपी से ही दो बार विधायक रहे हैं.
झूमा सोलंकी
खरगोन की भीकनगांव सीट से विधायक चुनी गईं. वे रामपुर बघेलान सीट से 1998 में विधायक चुने गए दिवंगत जवान सिंह पटेल की भाभी हैं.
अनुभा मुंजारे
बालाघाट सीट से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीती अनुभा मुंजारे बालाघाट के पूर्व सांसद रहे कंकर मुंजारे की पत्नी हैं.
कांग्रेस में भी परिवार पार्टी पर हावी, फैमिली फोर्स पर आए ये चेहरे
बीजेपी के साथ कांग्रेस में भी ऐसे नेताओं की कतार लंबी है. जिन नेताओं को परिवार की पर्ची लगाकर विधानसभा में एंट्री मिली.
जयवर्धन सिंह
पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के बेटे जयवर्धन सिंह कमलनाथ सरकार में मंत्री भी बने और राघौगढ़ से मौजूदा कांग्रेस विधायक हैं.
विक्रांत भूरिया
कांतिलाल भूरिया के बेटे विक्रांत भूरिया झाबुआ सीट से पिता की जमी जमाई सियासत को संभाल रहे हैं और कांग्रेस से विधायक बने हैं.
उमंग सिंघार
धार की गंधवानी सीट से विधायक और नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार की पूरी राजनीति उनकी बुआ पूर्व नेता प्रतिपक्ष जमुना देवी के जमाई हुई थी. जिस पर अब वो पैर जमाए खड़े हैं.
हेमंत सत्यदेव कटारे
भिंड के अटेर से विधायक हेमंत कटारे कांग्रेस के पूर्व मंत्री दिवंगत सत्यदेव कटारे के बेटे के तौर पर कांग्रेस में अटेर सीट की नुमाइंदगी कर रहे हैं. उनके पिता इसी सीट से विधायक रहते हुए कांग्रेस की सरकार में मंत्री रहे.
आतिफ अकील
बीजेपी के लिए चुनौती बन गई भोपाल की उत्तर सीट से विधायक आरिफ अकील जब बीमार हुए तो सहानुभूति पर सवार चुनाव में कांग्रेस में मौका आतिफ अकील को मिला, वे अब वे कांग्रेस और उनके परिवार की पुश्तैनी सीट से विधायक हैं.
अजय सिंह
सीधी सीट से विधायक अजय सिंह को राजनीति मंच उनके पिता पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह की बदौलत मिला. अब भले वे अपने बूते आगे बढ़े हों, लेकिन लॉचिंग पिता के रहते ही हो गई थी.
अशोक ईश्वर दास रोहाणी
अशोक रोहाणी के पिता ईश्वर दास रोहाणी विधानसभा में 10 साल स्पीकर रहे. 2003 से तेरह तक का उनका कार्यकाल था. अब उनके निधन के बाद उनके बेटे जबलपुर कैंट से विधायक हैं.
संजय पाठक
विजयराघवगढ़ से विधायक संजय पाठक ने भले कांग्रसे से बीजेपी ज्वाइन कर ली हो, लेकिन राजनीति में पैर जमाकर खड़े हो पाए तो ये कांग्रेस के मंत्री रह चुके सत्येन्द्र पाठक की बदौलत ही मुमकिन हुआ.
हेमंत खंडेलवाल
बीजेपी के मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष भी अचानक राजनीति में आए. गैर राजनीतिक जीवन बिता रहे खंडेलावल को उनके पिता विजय खंडेलवाल के निधन के बाद बीजेपी का उममीदवार बनाया गया. वे बैतूल से बीजेपी के 4 बार सांसद रहे.
उमाकांत शर्मा
भाई की बदौलत भी नैया पार हुई है. सिंरोज विधानसभा सीट से विधायक उमाकांत शर्मा इसकी मिसाल हैं. उन्हें भाई लक्ष्मीकांत शर्मा के निधन के बाद इस सीट से चुनाव लड़ाया गया.
राजघराने का रसूख और राजनीति के राजा महाराजा
मध्य प्रदेश में सांसदों में परिवार ही नहीं राजघराने से ताल्रलुक रखने वाले दो महत्वपूर्ण नाम ज्योतिरादित्य सिंधिया और दिग्विजय सिंह का है. सूबे की राजनीति में राजा और महाराजा के तौर पर पहचाने जाने वाले इन नेताओं के अलावा भी सांसद हैं. परिवार की बदौलत जो देश की संसद तक पहुंच गए. डेमोक्रेटिक रिफोर्म की रिपोर्ट के मुताबिक लोकसभा में कांग्रेस और बीजेपी के मुताबिक परिवारवाद की बदौलत संसद तक पहुंचे जनप्रतिनिधियों की संख्या 5 हैं. जबकि राज्यसभा में 2 सांसद परिवार के दम पर पहुंचे. वहीं कांग्रेस में भी राज्यसभा में पहुंचे दोनों नेताओं के पीछे ताकतवर पॉलीटिकल बैकग्राउण्ड रहा.
ज्योतिरादित्य सिंधिया
लोकसभा में गुना सीट से बीजेपी के सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया के पिता दादी और बुआओं तक पूरा परिवार कांग्रेस और बीजेपी की राजनीति में छंटा बंटा रहा. पिता माधव राव सिंधिया कांग्रेस में केनद्रीय मंत्री भी रहे. दोनों बुआओं ने दादी राजमाता विजयाराजे सिंधिया की परंपरा से बीजेपी की डोर थामे और देर सबेर ही सही ज्योतिरादित्य भी पहले राज्यसभा और अब लोकसभा का चुनाव लड़कर उसी नाव के सवार हुए.
दिग्विजय सिंह
कांग्रेस के राज्यसभा सांसद पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह भी राजनीतिक परिवार से आते हैं. पिता राजा बलभद्र सिंह 1952 में विधायक चुने गए थे. भाई लक्ष्मण सिंह भी राजनीति में आए और सांसद भी चुने गए. बेटा जयवर्धन सिंह भी कांग्रेस से ही विधायक चुने गए.
अशोक सिंह
कांग्रेस से राज्यसभा सांसद चुनकर भेजे गए. अशोक सिंह के पिता राजेन्द्र सिंह 90 के दशक में कांग्रेस के विधायक और मंत्री रहे हैं.













