Friday, August 21, 2026
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MP News: मां के दबाव में POCSO केस! कोर्ट में नाबालिग ने खोली सच्चाई, बोली- पापा के साथ ही सुरक्षित हूं

MP High Court Child Custody Case: एमपी हाईकोर्ट कस्टडी मामला एक ऐसे पारिवारिक विवाद से जुड़ा है, जिसमें माता-पिता के बीच चल रहे कानूनी संघर्ष का असर एक नाबालिग बच्ची पर पड़ा। मामले की सुनवाई करते हुए मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने बच्ची की कस्टडी उसके पिता को सौंपने का आदेश दिया। अदालत ने फैसला देते समय बच्ची की इच्छा और उसके हित को सबसे महत्वपूर्ण माना।

एमपी हाईकोर्ट कस्टडी मामला में पिता के खिलाफ पॉक्सो कानून और छेड़छाड़ से जुड़े आरोप दर्ज कराए गए थे। शिकायत के बाद पुलिस ने कार्रवाई करते हुए बच्ची को पिता से अलग कर शेल्टर होम भेज दिया था। इसके बाद पिता ने इस कार्रवाई को हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए अपनी बेटी की कस्टडी की मांग की।

कोर्ट में बच्ची ने दिया अपना पक्ष
एमपी हाईकोर्ट कस्टडी मामला की सुनवाई के दौरान अदालत ने बच्ची को व्यक्तिगत रूप से पेश होने के लिए बुलाया। न्यायाधीश ने उससे अलग से बातचीत की, ताकि वह बिना किसी दबाव के अपनी बात रख सके। सुनवाई के दौरान बच्ची ने अदालत को एक लिखित पत्र भी सौंपा।बच्ची ने अदालत के सामने कहा कि वह अपने पिता के साथ सुरक्षित महसूस करती है और उनके साथ रहना चाहती है। उसने यह भी बताया कि वह अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहती है और अपनी इच्छा से पिता के साथ रहना चाहती है।
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अदालत ने बच्चे के हित को दी प्राथमिकता
एमपी हाईकोर्ट कस्टडी मामला में अदालत ने कहा कि किसी भी कस्टडी विवाद में सबसे महत्वपूर्ण बच्चे का हित और उसकी भलाई होती है। यदि बच्चा अपनी इच्छा स्पष्ट रूप से व्यक्त करने की स्थिति में है, तो उसकी राय को भी उचित महत्व दिया जाना चाहिए।अदालत ने उपलब्ध तथ्यों और बच्ची के बयान पर विचार करने के बाद उसकी कस्टडी पिता को सौंपने का आदेश दिया।

बच्चों को विवाद का माध्यम नहीं बनाया जा सकता
एमपी हाईकोर्ट कस्टडी मामला की सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि माता-पिता के आपसी विवाद का असर बच्चों के भविष्य पर नहीं पड़ना चाहिए। न्यायालय ने कहा कि पारिवारिक विवादों में बच्चों का हित सर्वोपरि है और उन्हें किसी भी कानूनी लड़ाई का माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिए।

मामले ने खींचा लोगों का ध्यान
एमपी हाईकोर्ट कस्टडी मामला अपने संवेदनशील पहलुओं के कारण चर्चा में है। अदालत के इस फैसले को बाल हितों और कस्टडी मामलों में बच्चे की इच्छा को महत्व देने वाले महत्वपूर्ण निर्णय के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, मामले से जुड़े अन्य कानूनी पहलुओं पर संबंधित न्यायिक प्रक्रिया आगे भी जारी रह सकती है।

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