Gudakhu Health Risk: गुड़ाखू का खतरा अब छत्तीसगढ़ में एक गंभीर स्वास्थ्य चुनौती बनता जा रहा है। हाल ही में किए गए एक सर्वे में सामने आया है कि राज्य में गुटखे के बाद सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला तंबाकू उत्पाद गुड़ाखू है। गुड़ाखू का खतरा खासकर महिलाओं और बुजुर्गों के बीच तेजी से बढ़ रहा है, जबकि अधिकांश लोगों को इसके नुकसान की जानकारी होने के बावजूद वे इसका सेवन जारी रखे हुए हैं।
गुड़ाखू का खतरा समझने के लिए पहले यह जानना जरूरी है कि गुड़ाखू आखिर होता क्या है। गुड़ाखू तंबाकू की बारीक धूल, गुड़ या शीरा, चूना और लाल मिट्टी का गाढ़ा मिश्रण होता है। इसे लोग दांतों और मसूड़ों पर रगड़कर मंजन या नशे के रूप में इस्तेमाल करते हैं।छत्तीसगढ़, ओडिशा, झारखंड और मध्यप्रदेश के कई हिस्सों में यह वर्षों से प्रचलित है। हालांकि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) इसे धुआं रहित तंबाकू यानी Smokeless Tobacco की श्रेणी में रखता है और इसे स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक मानता है।
कैसे तैयार किया जाता है गुड़ाखू?
गुड़ाखू का खतरा इसकी सामग्री से भी जुड़ा है। इसे बनाने में मुख्य रूप से तंबाकू की धूल, गुड़ या शीरा, चूना और लाल मिट्टी मिलाई जाती है।तंबाकू में निकोटीन और कैंसर पैदा करने वाले तत्व होते हैं। चूना निकोटीन को तेजी से शरीर में पहुंचाने में मदद करता है। गुड़ मिश्रण को चिपचिपा बनाता है, जबकि लाल मिट्टी इसे खास रंग और बनावट देती है।जब लोग इसे 10 से 15 मिनट तक मसूड़ों पर रगड़ते हैं, तो इसके जहरीले तत्व सीधे मुंह की झिल्ली से शरीर में पहुंच जाते हैं।
सर्वे में क्या सामने आया?
गुड़ाखू का खतरा पर किए गए अध्ययन में रायपुर, अंबिकापुर, राजनांदगांव, नारायणपुर और गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिलों के 2566 लोगों को शामिल किया गया। इनमें 811 लोग तंबाकू उपभोक्ता पाए गए।रिपोर्ट के अनुसार छत्तीसगढ़ में तंबाकू सेवन का अनुपात राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक है। राज्य में तंबाकू उपयोग की दर 34 प्रतिशत से अधिक दर्ज की गई, जबकि कई क्षेत्रों में यह आंकड़ा और ज्यादा है।
गुटखे के बाद सबसे ज्यादा इस्तेमाल
गुड़ाखू का खतरा इसलिए भी बढ़ रहा है क्योंकि सर्वे के अनुसार गुटखे के बाद सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला तंबाकू उत्पाद गुड़ाखू है। लगभग 41 प्रतिशत उपभोक्ता इसका उपयोग करते हैं।यह आदत खासकर 40 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों और महिलाओं में अधिक देखी गई। चिंता की बात यह है कि अन्य तंबाकू उत्पादों की तुलना में गुड़ाखू छोड़ने की इच्छा सबसे कम पाई गई।
मुंह के कैंसर का बड़ा कारण
गुड़ाखू का खतरा सीधे तौर पर मुंह, जीभ, मसूड़ों और गले के कैंसर से जुड़ा हुआ है। कैंसर विशेषज्ञों का कहना है कि इसमें मौजूद कैंसर पैदा करने वाले रसायन लंबे समय तक मसूड़ों के संपर्क में रहते हैं।मुंह में न भरने वाले घाव, सफेद या लाल धब्बे, बार-बार जलन और निगलने में परेशानी जैसे लक्षण शुरुआती चेतावनी हो सकते हैं।
मुंह का लॉक होना और दांतों का नुकसान
गुड़ाखू का खतरा सिर्फ कैंसर तक सीमित नहीं है। लगातार सेवन करने से मुंह के अंदर की त्वचा सख्त होने लगती है। धीरे-धीरे मुंह पूरा खोलने में दिक्कत होती है। इसे चिकित्सा भाषा में सबम्यूकस फाइब्रोसिस कहा जाता है।इसके अलावा दांतों की ऊपरी सुरक्षा परत नष्ट होने लगती है। दांत काले पड़ जाते हैं, मसूड़े कमजोर हो जाते हैं और समय से पहले दांत गिरने लगते हैं।
दिल और ब्लड प्रेशर पर असर
गुड़ाखू का खतरा हृदय रोगों से भी जुड़ा हुआ है। निकोटीन रक्त वाहिकाओं को सिकोड़ देता है, जिससे ब्लड प्रेशर बढ़ सकता है। लंबे समय तक इसका सेवन हार्ट अटैक और स्ट्रोक के खतरे को भी बढ़ा सकता है।
महिलाओं के लिए ज्यादा खतरनाक
गुड़ाखू का खतरा महिलाओं में और भी गंभीर असर छोड़ सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार गर्भावस्था के दौरान इसका सेवन गर्भपात, कम वजन वाले बच्चे के जन्म और शिशु के विकास पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।
मंजन नहीं, लत है
गुड़ाखू का खतरा इसलिए भी बढ़ रहा है क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में कई लोग इसे दांत साफ करने का साधन मानते हैं। कई लोगों को लगता है कि इससे दांत मजबूत होते हैं या पेट साफ रहता है।असल में यह निकोटीन की लत का असर होता है। जब व्यक्ति इसका सेवन नहीं करता तो सिरदर्द, बेचैनी और कब्ज जैसी समस्याएं होने लगती हैं, जिन्हें लोग गलतफहमी में सामान्य मान लेते हैं।
विशेषज्ञों की सलाह
गुड़ाखू का खतरा देखते हुए डॉक्टरों का कहना है कि यदि किसी व्यक्ति को इस आदत की लत है तो उसे जल्द से जल्द तंबाकू मुक्ति केंद्र या स्वास्थ्य विशेषज्ञ की मदद लेनी चाहिए। समय रहते इस आदत को छोड़ना कैंसर और कई गंभीर बीमारियों से बचने का सबसे प्रभावी तरीका है।









