निशानेबाज न्यूज़ डेस्क : आज की तेज़ रफ्तार जिंदगी में अनियमित दिनचर्या और असंतुलित खानपान के कारण लोग कई गंभीर बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और कैंसर जैसी बीमारियों के मामले हर साल लाखों की संख्या में सामने आ रहे हैं। इनमें डायबिटीज एक ऐसी बीमारी है, जो धीरे-धीरे शरीर को नुकसान पहुंचाती है, लेकिन समय रहते पहचान होने पर इसे नियंत्रित किया जा सकता है।
क्या है डायबिटीज मेलिटस
डायबिटीज मेलिटस एक मेटाबोलिक डिसऑर्डर है, जिसमें रक्त में ग्लूकोज (शुगर) का स्तर लगातार बढ़ा रहता है। इसका मुख्य कारण या तो शरीर में इंसुलिन का पर्याप्त उत्पादन न होना है, या फिर शरीर का इंसुलिन का सही तरीके से उपयोग न कर पाना। यदि इसकी पहचान शुरुआती चरण में हो जाए, तो इलाज और नियंत्रण आसान हो जाता है।
डायबिटीज के क्लासिक ‘3P’ लक्षण
डायबिटीज के सबसे आम और शुरुआती लक्षणों को मेडिकल भाषा में ‘तीन पी’ (3P) कहा जाता है।
1. पॉलीयूरिया (Polyuria):
बार-बार और अधिक मात्रा में पेशाब आना। जब ब्लड शुगर बढ़ जाती है, तो किडनी अतिरिक्त ग्लूकोज को पेशाब के जरिए बाहर निकालने की कोशिश करती है।
2. पॉलीडिप्सिया (Polydipsia):
अत्यधिक प्यास लगना। बार-बार पेशाब आने से शरीर में पानी की कमी हो जाती है, जिससे लगातार प्यास महसूस होती है।
3. पॉलीफेजिया (Polyphagia):
बहुत ज्यादा भूख लगना। शरीर को ऊर्जा के लिए ग्लूकोज नहीं मिल पाता, इसलिए भूख बढ़ती है, लेकिन इसके बावजूद वजन कम हो सकता है।
लक्षण दिखें तो तुरंत कराएं जांच
एक्सपर्ट्स के अनुसार, अगर किसी व्यक्ति में ये तीनों लक्षण नजर आते हैं, तो ब्लड शुगर की जांच तुरंत करानी चाहिए। इन संकेतों को नजरअंदाज करना आगे चलकर हृदय रोग, किडनी फेलियर, आंखों की रोशनी कम होना और नसों को नुकसान जैसी गंभीर समस्याओं का कारण बन सकता है।
आयुष मंत्रालय की अपील
भारत सरकार के आयुष मंत्रालय ने डायबिटीज मेलिटस के प्रमुख लक्षणों को लेकर जागरूकता फैलाते हुए लोगों से अपील की है कि वे अपने शरीर के संकेतों को हल्के में न लें। समय पर पहचान और सही प्रबंधन से इस बीमारी को नियंत्रित किया जा सकता है।
जीवनशैली और पारंपरिक चिकित्सा की भूमिका
डायबिटीज के प्रबंधन में संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और स्वस्थ जीवनशैली की अहम भूमिका होती है। इसके साथ-साथ आयुर्वेद, योग और अन्य पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियां भी डायबिटीज कंट्रोल करने में सहायक मानी जाती हैं। नियमित जांच और जागरूकता ही इससे बचाव का सबसे प्रभावी तरीका है।













