Chhattisgarh High Court : बिलासपुर। मानसिक बीमारी के आधार पर तलाक के मामलों को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि पति या पत्नी अगर यह दावा करते हैं कि जीवनसाथी मानसिक रोग से पीड़ित है, तो केवल डॉक्टर की पर्ची या दवा का नुस्खा पर्याप्त सबूत नहीं माना जाएगा। ऐसे मामलों में उपचार करने वाले मनोरोग विशेषज्ञ की गवाही और ठोस प्रमाण प्रस्तुत करना अनिवार्य है।
Chhattisgarh High Court : मामला रायगढ़ जिले का है, जहां एक पति ने पत्नी को सिजोफ्रेनिया से पीड़ित बताते हुए हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 12(1)(बी) के तहत विवाह निरस्त करने की मांग की थी। शादी वर्ष 2008 में हुई थी और दंपत्ति की दो बेटियां भी हैं। पति ने आरोप लगाया कि शादी के बाद पत्नी का व्यवहार असामान्य हो गया, वह गुस्से में बच्चों को पीटती और सामान फेंकती थी। चिकित्सकीय जांच में बीमारी की पुष्टि होने का दावा भी किया गया।
पत्नी ने अदालत में कहा कि वह वर्ष 2018 से मायके में रह रही है और पति का आरोप निराधार है। पारिवारिक न्यायालय ने पहले ही पति की याचिका खारिज कर दी थी। इसके खिलाफ पति हाईकोर्ट पहुंचा।
जस्टिस रजनी दुबे और जस्टिस ए.के. प्रसाद की डिवीजन बेंच ने पारिवारिक न्यायालय के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा— “मानसिक बीमारी को विवाह निरस्त करने का आधार बनाने के लिए केवल दवाइयों की पर्ची पेश करना पर्याप्त नहीं है। जब तक मनोरोग विशेषज्ञ स्वयं अदालत में आकर गवाही न दें, तब तक इसे साबित नहीं माना जाएगा।”













