Sunday, August 23, 2026
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Barkai Village Tradition: बस्तर में आस्था और रोमांच का अनोखा संगम,कोंडागांव के बरकई गांव में ‘बंधा मतौर’ की गूंज, ढोल की थाप सुनते ही पानी में उछलने लगीं मछलियां

कोंडागांव/केशकाल: छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग के ग्रामीण अंचलों की अनूठी संस्कृति और लोक-परंपराएं पूरे देशभर में अपनी एक अलग और विशिष्ट पहचान रखती हैं। इसी कड़ी में कोंडागांव जिले का ग्राम बरकई इन दिनों अपनी एक बेहद अनोखी और ऐतिहासिक परंपरा ‘बंधा मतौर’ को लेकर चारों तरफ चर्चा का विषय बना हुआ है। हर तीन साल में एक बार आयोजित होने वाले इस पारंपरिक उत्सव में हजारों की संख्या में ग्रामीण एक साथ तालाब में उतरकर मछली पकड़ते हैं। इस आयोजन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि पूजा-अर्चना के बाद जैसे ही ढोल-नगाड़ों की थाप गूंजती है, तालाब की मछलियां पानी में ऊपर की ओर उछलने लगती हैं।

मालगुजारों के जमाने से चली आ रही है यह प्रथा

इस अनोखी परंपरा के पीछे एक दिलचस्प और गौरवशाली इतिहास छुपा हुआ है। स्थानीय जानकारों के अनुसार, दशकों पहले ग्राम बरकई के तत्कालीन मालगुजारों ने स्थानीय ग्रामीणों के सामूहिक श्रमदान के सहयोग से इस विशाल तालाब का निर्माण करवाया था। तालाब का निर्माण पूरा होने के बाद मालगुजारों ने समाज में एकता और भाईचारा बढ़ाने के उद्देश्य से यह अनूठी परंपरा शुरू की थी कि हर तीन वर्ष में एक बार इस तालाब की सभी मछलियां गांववासियों और बाहर से आने वाले मेहमानों के लिए पूरी तरह से छोड़ दी जाएंगी। तभी से “बंधा मतौर” की यह खूबसूरत परंपरा लगातार बिना रुके निभाई जा रही है।

₹200 का शुल्क देकर तालाब में उतरते हैं हजारों लोग

इस भव्य आयोजन की व्यवस्था और तालाब के रखरखाव के लिए समिति द्वारा एक निश्चित नियम बनाया गया है। इस उत्सव में शामिल होकर तालाब में उतरने और मछली पकड़ने के लिए प्रत्येक इच्छुक व्यक्ति को ₹200 का प्रवेश शुल्क जमा करना पड़ता है। इस बार भी तय समय आने पर कोंडागांव समेत आसपास के कई जिलों से रिकॉर्ड संख्या में लोग इस अद्भुत दृश्य के गवाह बनने और इसमें हिस्सा लेने पहुंचे। हजारों की संख्या में पहुंचे ग्रामीणों ने उत्साहपूर्वक जाल और अपने पारंपरिक उपकरणों के साथ तालाब में छलांग लगाई और सामूहिक रूप से मछली पकड़ने के रोमांच का जमकर आनंद लिया।

ग्राम देवी की विशेष पूजा-अर्चना से होती है शुरुआत

इस पूरे पारंपरिक कार्यक्रम की शुरुआत गांव के वर्तमान मालगुजार, मुख्य पुजारी और पटेल द्वारा ग्राम देवी की विधि-विधान से पूजा-अर्चना और सिंदूर अर्पण करने के साथ की जाती है। पूजा संपन्न होते ही पारंपरिक ढोल-नगाड़ों की कड़क गूंज पूरे माहौल को असीम उत्साह और ऊर्जा से भर देती है। बुजुर्ग ग्रामीणों का अटूट विश्वास है कि ढोल की विशिष्ट थाप को सुनकर तालाब की मछलियां पानी में ऊपर उछलने लगती हैं, जो इस पूरे आयोजन का सबसे मुख्य और जादुई आकर्षण माना जाता है। स्थानीय लोगों के अनुसार, बरकई बस्तर का एकमात्र ऐसा गांव है जहां यह आदिम परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा के साथ जीवित है।

मालगुजार द्वारा जल स्पर्श के साथ होता है समापन

आयोजन समिति के पदाधिकारियों का कहना है कि सोशल मीडिया और मीडिया के माध्यम से हर साल इस कार्यक्रम की लोकप्रियता देश के अन्य हिस्सों में भी लगातार बढ़ती जा रही है। यही कारण है कि आने वाले वर्षों में इसे और अधिक भव्य और व्यवस्थित रूप देने की विशेष तैयारी की जा रही है ताकि बस्तर की संस्कृति को वैश्विक मंच मिल सके। वहीं, इस पारंपरिक कार्यक्रम के अंतिम चरण में गांव के मालगुजार द्वारा पूरे आदर के साथ तालाब के पानी को स्पर्श किया जाता है और इसके साथ ही “बंधा मतौर” उत्सव के समाप्त होने की आधिकारिक घोषणा की जाती है, जिसे इस पूरे आयोजन का सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण क्षण माना जाता है।

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