Bilaspur Sterilization Tragedy Verdict : बिलासपुर (गौरीशंकर गुप्ता)। छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य इतिहास के सबसे काले अध्याय ‘बिलासपुर नसबंदी कांड’ में 11 साल के लंबे इंतजार के बाद अदालत ने अपना फैसला सुना दिया है। न्यायालय ने मुख्य सर्जन डॉ. आरके गुप्ता को दोषी करार देते हुए 2 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। वहीं, इस मामले में सह-आरोपी रहे स्वास्थ्य विभाग के 5 अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया गया है।
क्या था पूरा मामला? यह हृदयविदारक घटना वर्ष 2014 की है, जब बिलासपुर जिले के पेंडारी (तखतपुर) के एक नसबंदी शिविर में लापरवाही की सारी हदें पार कर दी गई थीं। शिविर में नसबंदी कराने आई महिलाओं की तबीयत बिगड़ने लगी, जिसके बाद 18 महिलाओं को गंभीर हालत में अस्पताल भर्ती कराया गया। इस लापरवाही ने 12 महिलाओं की जान ले ली थी। इस घटना ने उस वक्त पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था और राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए थे।
कोर्ट का फैसला और डॉ. गुप्ता पर आरोप अदालत ने जांच रिपोर्ट और गवाहों के आधार पर पाया कि डॉ. आरके गुप्ता ने निर्धारित चिकित्सा दिशानिर्देशों (Medical Guidelines) का उल्लंघन किया था।
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दोषी करार: डॉ. गुप्ता को आईपीसी की धारा 304(2) (लापरवाही से मृत्यु कारित करना) के तहत दोषी पाया गया।
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जुर्माना: सजा के साथ-साथ कोर्ट ने प्रत्येक मृतक महिला के परिवार के लिए अलग-अलग जुर्माने की राशि भी तय की है।
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अन्य आरोपी बरी: शिविर संचालन और प्रबंधन से जुड़े 5 अन्य आरोपियों के खिलाफ आरोप सिद्ध नहीं हो सके, जिसके कारण उन्हें “संदेह का लाभ” देते हुए बरी कर दिया गया।
पीड़ित परिवारों में असंतोष: “अधूरा रहा न्याय” अदालत के इस फैसले पर पीड़ित परिवारों ने मिली-जुली प्रतिक्रिया दी है। कई परिवारों का मानना है कि 12 मौतों के बदले 2 साल की सजा बहुत कम है। पीड़ितों का कहना है कि इस पूरे कांड में कई उच्चाधिकारी भी शामिल थे, जिन्हें जांच के दायरे से बाहर रखा गया। न्याय की इस लंबी लड़ाई के बाद भी कई माताओं और बहनों को खोने वाले परिवार आज भी खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।











