नई दिल्ली। दिल्ली की अदालत ने यौन उत्पीड़न, वित्तीय धोखाधड़ी और गबन के आरोपों में घिरे स्वामी चैतन्यानंद सरस्वती उर्फ पार्थ सारथी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि आरोप इतने गंभीर हैं कि आरोपी को अग्रिम जमानत देने का कोई औचित्य नहीं बनता।
अदालत ने नोट किया कि चैतन्यानंद पर जालसाजी, धोखाधड़ी, छद्मवेश और आपराधिक विश्वासघात जैसे गंभीर आरोप हैं। पीठ का आरोप है कि आरोपी ने संस्थान और उससे जुड़ी संपत्तियों का निजी लाभ उठाने के लिए दुरुपयोग किया। जांच में लगभग 20 करोड़ रुपये की संपत्ति और करीब 8 करोड़ रुपये के बैंक खाते सामने आए।
मामले की शुरुआत दिसंबर 2024 में हुई, जब प्रारंभिक ऑडिट में वित्तीय अनियमितताएं उजागर हुईं। आरोपी ने श्री शारदा इंस्टीट्यूट ऑफ इंडियन मैनेजमेंट रिसर्च फाउंडेशन ट्रस्ट नाम से नया ट्रस्ट बनाकर संस्थान की कमाई और राजस्व को अपने निजी नियंत्रण में ले लिया।
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पूर्व छात्रों और पीड़ितों ने बताया कि चैतन्यानंद ने कई लड़कियों का यौन शोषण किया, जिनमें ज्यादातर आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि की छात्राएं थीं। उन्हें करियर और स्कॉलरशिप का लालच देकर फंसाया जाता और विरोध करने वाली छात्राओं को मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता।
इस बीच, दिल्ली पुलिस ने आरोपी से जुड़े 18 बैंक खाते और 28 एफडी फ्रीज कर दिए, जिनमें लगभग 8 करोड़ रुपये जमा थे। पुलिस का मानना है कि यह राशि धोखाधड़ी के माध्यम से नियंत्रित की जा रही थी।
पूर्व छात्रों ने बताया कि चैतन्यानंद का पूरा नेटवर्क संस्थान में काम करता था और विरोध करने वालों को दबाया जाता था। इस मामले में दर्ज शिकायतों और फ्रीज किए गए खातों से उसके घोटालों और अपराधों की पूरी सच्चाई उजागर हो रही है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि चैतन्यानंद के खिलाफ दर्ज आरोप न केवल वित्तीय धोखाधड़ी बल्कि संस्थान के हितधारकों के साथ विश्वासघात से भी जुड़े हैं, इसलिए उसकी अग्रिम जमानत खारिज कर दी गई।













