नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार को एक बड़ा कदम उठाते हुए एच-1बी वीज़ा की फीस को 100,000 डॉलर (करीब 88 लाख रुपये) करने का ऐलान किया। व्हाइट हाउस ने इस फैसले का बचाव करते हुए कहा कि कंपनियां लंबे समय से इस वीजा प्रोग्राम का गलत इस्तेमाल कर रही थीं। विदेशी कर्मचारियों को कम वेतन पर नियुक्त करने के कारण लाखों अमेरिकी नौकरियां प्रभावित हुईं।
व्हाइट हाउस द्वारा जारी बयान में कहा गया कि यह कदम अमेरिकी श्रमिकों की नौकरियों की रक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने और “अमेरिका फर्स्ट” नीति को मजबूत करने के लिए जरूरी है।
ट्रंप प्रशासन के 9 तर्क
1. टेक सेक्टर में विदेशी श्रमिकों का दबदबा
2003 में आईटी सेक्टर की 32% नौकरियां H-1B वीजाधारकों के पास थीं, जो 2025 में बढ़कर 65% से अधिक हो गईं।
2. अमेरिकी ग्रेजुएट्स में बढ़ती बेरोजगारी
कंप्यूटर साइंस में बेरोजगारी दर 6.1% और कंप्यूटर इंजीनियरिंग में 7.5% दर्ज की गई, जो अन्य विषयों की तुलना में कहीं अधिक है।
3. विदेशी बनाम अमेरिकी रोजगार
2000 से 2019 तक विदेशी STEM वर्कर्स की संख्या दोगुनी हुई, जबकि कुल STEM नौकरियों में सिर्फ 44.5% वृद्धि हुई।
4. छंटनी और वीजा मंजूरी का खेल
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एक कंपनी ने 5,189 H-1B वीजा लेने के बाद 16,000 अमेरिकियों की नौकरी छीन ली।
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दूसरी ने 2,400 नौकरियां काटीं और 1,698 H-1B मंजूर करवाए।
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कुछ कंपनियों ने 27,000 अमेरिकी कर्मचारियों को हटाते हुए 25,000 से अधिक वीजा स्वीकृतियां हासिल कीं।
5. मजबूरन रिप्लेसमेंट ट्रेनिंग
अमेरिकी कर्मचारियों को एनडीए (गोपनीयता समझौते) के तहत अपने ही रिप्लेसमेंट विदेशी कर्मचारियों को ट्रेनिंग देने के लिए बाध्य किया गया।
6. घरेलू वर्कफोर्स पर खतरा
युवा अमेरिकियों को टेक सेक्टर में आने से हतोत्साहित किया जा रहा है क्योंकि नौकरी की सुरक्षा और वेतन प्रतिस्पर्धा घट गई है।
7. राष्ट्रीय सुरक्षा चिंता
विदेशी कर्मचारियों पर निर्भरता अमेरिका की तकनीकी और सामरिक क्षमता को कमजोर कर सकती है।
8. सुधारात्मक कदम
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श्रम विभाग वेतन नियमों में बदलाव करेगा ताकि विदेशी कर्मचारियों को भी उचित सैलरी मिले।
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गृह सुरक्षा विभाग उच्च वेतन और उच्च कौशल वाली नौकरियों को वीजा स्वीकृति में प्राथमिकता देगा।
9. ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति
ट्रंप प्रशासन का दावा है कि उनके कार्यकाल में सभी नई नौकरियां अमेरिकी नागरिकों को दी गईं और सरकारी ट्रेनिंग प्रोग्राम अब सिर्फ उनके लिए आरक्षित हैं।
भारतीय कंपनियों पर असर
भारतीय आईटी कंपनियां जैसे इन्फोसिस, टीसीएस, विप्रो और एचसीएल सबसे ज्यादा H-1B वीजा लेती रही हैं। नई फीस से इन कंपनियों का खर्चा कई गुना बढ़ जाएगा।
- विशेषज्ञ मानते हैं कि अब कंपनियां अमेरिका में स्थानीय कर्मचारियों को ज्यादा प्राथमिकता देंगी।
- इससे भारतीय प्रोफेशनल्स का अमेरिका जाकर काम करने का सपना और कठिन हो जाएगा।
ट्रंप का बचाव
राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा, “यह कदम अमेरिकी नौकरियों की रक्षा के लिए अनिवार्य है। अब केवल वे ही लोग वीजा पाएंगे जो सुपर-स्किल्ड हैं और उच्च वेतन पर काम करने के लिए योग्य हैं।”











