पुरी, ओडिशा। हर साल आषाढ़ महीने की शुक्ल द्वितीया तिथि को भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा के रथों के साथ पुरी में भव्य रथ यात्रा निकलती है। यह यात्रा सिर्फ धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक जटिलता का प्रतीक भी है।
इस साल रथ यात्रा 27 जून से शुरू होकर 5 जुलाई को समाप्त हुई। रथ निर्माण में 58 दिनों का समय लगता है और रथ 45 फीट ऊंचे होते हैं। लकड़ियां ओडिशा के जंगलों से लाकर अक्षय तृतीया से रथ बनाने की प्रक्रिया शुरू होती है।

रथ तोड़ने की परंपरा
रथ यात्रा समाप्त होने के बाद रथों को तोड़ने (विघटित) की परंपरा होती है। सबसे पहले देवी सुभद्रा के देवदलन रथ को तोड़ा जाता है, उसके बाद श्रीबलभद्र और महाप्रभु श्रीजगन्नाथ के रथ। रथ तोड़ने की प्रक्रिया लगभग 12 से 15 दिन तक चलती है। इस दौरान कलश, पारा भाड़ी, द्वारबेडा जैसे कई हिस्से उतार दिए जाते हैं।
लकड़ियों का उपयोग
रथ के प्रमुख हिस्सों जैसे सिंहासन, प्रभा, नाटगोड़, गूज और चक्र को रथ गोदाम में सुरक्षित रखा जाता है। कुछ हिस्सों की नीलामी भक्तों के लिए होती है। रथ तोड़ने के बाद बची लकड़ी को कोठ भोग रसोई में जलावन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, जिससे लगभग 6-7 महीने तक भोजन तैयार किया जा सकता है।
पहियों की नीलामी
रथ का सबसे कीमती हिस्सा पहिया होता है। इसकी नीलामी की जाती है, जिसकी शुरुआती बोली 50 हजार रुपए से शुरू होकर लाखों तक पहुंचती है। ऐसा माना जाता है कि रथ के पहिया को घर में रखने से सुख-शांति और समृद्धि आती है।











