शहडोल। Nishaanebaz.com-Shahdol Ration Scam: मध्य प्रदेश के शहडोल जिले से सरकारी योजनाओं में चल रहे बड़े भ्रष्टाचार और घपले का एक सनसनीखेज मामला सामने आया है। एक तरफ जहां सरकार गरीबों और जरूरतमंदों को मुफ्त व नियमित राशन उपलब्ध कराने के बड़े-बड़े दावे करती है, वहीं शहडोल में गरीब आदिवासियों और ग्रामीणों के निवाले पर सीधे डाका डाले जाने का मामला प्रकाश में आया है। आरोप है कि शासकीय उचित मूल्य दुकान पर उपभोक्ताओं से धोखे से अंगूठा तो लगवा लिया गया, लेकिन उन्हें पिछले दो महीनों से उनके कोटे का राशन नहीं दिया गया।
बुढ़ार जनपद के छतई गांव का है पूरा मामला यह पूरा गंभीर मामला बुढ़ार जनपद पंचायत के अंतर्गत आने वाले छतई गांव का है। शहडोल जिले के झिकबिजरी लैम्प्स के तहत संचालित होने वाली छतई की शासकीय राशन दुकान के तत्कालीन विक्रेता मोहम्मद अमीन पर यह गंभीर आरोप लगे हैं कि उसने चालाकी से हितग्राहियों के अंगूठे के निशान लगवा लिए और उनके हिस्से का पूरा राशन अवैध तरीके से आहरित कर लिया, लेकिन उपभोक्ताओं के घरों तक अनाज का एक दाना भी नहीं पहुंचा। इस कथित धांधली और अनियमितता से जुड़ा एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें ग्रामीण अपनी व्यथा और रोष प्रकट कर रहे हैं।
विक्रेता निलंबित, लेकिन समस्या जस की तस ग्रामीणों की लगातार शिकायतों और बढ़ते आक्रोश के बाद विभागीय स्तर पर जांच की गई, जिसके आधार पर तत्कालीन विक्रेता मोहम्मद अमीन को निलंबित कर दिया गया है। इसके बाद दुकान के संचालन की जिम्मेदारी नए विक्रेता जैनुल को सौंप दी गई है। हालांकि, स्थानीय ग्रामीणों और पीड़ित परिवारों का दर्द अभी भी कम नहीं हुआ है। उनका कहना है कि विक्रेता के बदलने के बावजूद उन्हें अब तक पिछले दो महीनों का रुका हुआ राशन नहीं मिला है, जिसके कारण वे अपने हक के अनाज के लिए लगातार कार्यालयों के चक्कर काटने को मजबूर हैं।
ग्रामीणों का छलका दर्द, कार्रवाई की मांग इस पूरी धांधली को लेकर उपभोक्ताओं में भारी गुस्सा व्याप्त है। भुक्तभोगी उपभोक्ता रंगदेव सिंह, जय भान सिंह, रामकली और अन्य पीड़ित महिलाओं ने शासन-प्रशासन से पुरजोर गुहार लगाई है कि उनके साथ की गई इस धोखाधड़ी की निष्पक्ष जांच हो, हड़पा गया राशन उन्हें जल्द से जल्द दिलाया जाए और दोषी विक्रेता के खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई की जाए। इस खुलासे के बाद एक बार फिर खाद्य विभाग की कार्यप्रणाली और सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) की पारदर्शिता पर गंभीर सवालिया निशान खड़े हो गए हैं।


