Raipur EOW Big Action: रायपुर। छत्तीसगढ़ की आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (EOW) रायपुर की टीम ने वित्तीय अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के खिलाफ एक बेहद बड़ी और ऐतिहासिक कानूनी कार्रवाई पूरी की है। ईओडब्ल्यू ने लगभग 30 साल पुराने और बहुचर्चित 1 करोड़ 86 लाख रुपये के गृह निर्माण ऋण गबन के मामले में गहन तफ्तीश के बाद तीन मुख्य आरोपियों के खिलाफ विशेष न्यायाधीश के समक्ष 15,000 पन्नों का विशालकाय चालान (आरोप पत्र) पेश कर दिया है।
इस हाई-प्रोफाइल घोटाले में शामिल आरोपियों ने एक सुनियोजित आपराधिक षड्यंत्र के तहत सरकारी आवासीय योजना की राशि का बंदरबांट किया था, जो ऋण अब ब्याज और पेनाल्टी सहित बढ़कर कुल 104 करोड़ रुपये का भारी-भरकम डूबत कर्ज (Bad Debt) बन चुका है।
क्या है 30 साल पुराना यह लोन घोटाला?
यह पूरा मामला अविभाजित मध्य प्रदेश के समय का यानी वर्ष 1995 से 1998 के दौरान का है। उस समय जरूरतमंद और मध्यमवर्गीय लोगों को अपना आशियाना मुहैया कराने के लिए एक सरकारी आवासीय योजना संचालित की जा रही थी। इस योजना के तहत ‘आधुनिक गृह निर्माण सहकारी समिति मर्यादित, रायपुर’ के तत्कालीन अध्यक्ष थावरदास माधवानी ने ‘मध्यप्रदेश राज्य सहकारी आवास संघ मर्यादित, भोपाल’ के रायपुर क्षेत्रीय कार्यालय के अधिकारियों के साथ मिलकर एक बड़ा फर्जीवाड़ा रचा।
समिति के 186 सदस्यों के नाम पर 1-1 लाख रुपये की दर से कुल 1 करोड़ 86 लाख रुपये का गृह निर्माण ऋण अलग-अलग किस्तों में स्वीकृत करा लिया गया। ऋण की यह पूरी राशि वास्तविक हितग्राहियों को मिलने के बजाय सीधे आरोपियों के खातों और जेबों में चली गई।



भौतिक सत्यापन में खुली पोल: कागजों पर तने थे महल, धरातल पर शून्य
इस बड़े गबन का खुलासा तब हुआ जब संबंधित विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा स्वीकृत लोन के एवज में निर्माण कार्यों का भौतिक सत्यापन (Physical Verification) कराया गया। जब जांच टीम मौके पर पहुंची तो अधिकारी दंग रह गए।
ऋण के सरकारी दस्तावेजों में दावा किया गया था कि रायपुर के रायपुरा और पंडरी कांपा क्षेत्र में सभी 186 सदस्यों के शानदार मकान बनकर तैयार हो चुके हैं, लेकिन धरातल पर एक भी मकान निर्मित नहीं पाया गया। वहां सिर्फ खाली जमीनें पड़ी हुई थीं। इतना ही नहीं, जिन सदस्यों (जैसे लक्ष्मीचंद चिमनानी, दिलीप कुमार बालानी, अमित कुमार आदि) के नाम पर फाइलें तैयार कर लोन पास कराया गया था, वे सभी लोग दस्तावेजों में दर्ज पतों से पूरी तरह नदारद और फर्जी मिले।
अफसरों और समिति अध्यक्ष की जुगलबंदी से हुआ गबन
ईओडब्ल्यू की जांच में यह पूरी तरह साफ हो गया कि आधुनिक गृह निर्माण सहकारी समिति के तत्कालीन अध्यक्ष थावरदास माधवानी, सहकारी आवास संघ मर्यादित रायपुर के तत्कालीन आवास पर्यवेक्षक बसंत कुमार साहू और सहकारी आवास संघ मर्यादित भोपाल के तत्कालीन प्रबंधक प्रदीप कुमार निखरा ने पद का दुरुपयोग करते हुए इस आपराधिक साजिश को अंजाम दिया था।
फर्जी सर्टिफिकेट के आधार पर बंटा पैसा:
आवास पर्यवेक्षक बसंत कुमार साहू ने बिना किसी मैदानी निरीक्षण या जांच के अपनी टेबल पर बैठकर ही फर्जी ‘उपयोगिता प्रमाण-पत्र’ (Utilization Certificate) और ‘भवन निर्माण पूर्णता प्रमाण-पत्र’ (Completion Certificate) जारी कर दिए थे। इन फर्जी कागजातों के आधार पर भोपाल मुख्यालय के तत्कालीन अधिकारी अनिल शर्मा और प्रदीप कुमार निखरा ने आंखें मूंदकर लोन की अंतिम किस्तें जारी कर दीं और बाद में इस पूरी रकम को आपस में बांट लिया गया।
1.86 करोड़ का लोन अब बन चुका है 104 करोड़ का ‘डूबत कर्ज’
आरोपियों की इस धोखाधड़ी और जालसाजी के कारण राज्य सहकारी आवास संघ को भारी वित्तीय आघात लगा है। ईओडब्ल्यू द्वारा खंगाले गए लेखा रिकॉर्ड के मुताबिक, 31 दिसंबर 2025 की स्थिति में इस फर्जी लोन की मूल राशि और पिछले तीन दशकों से उस पर जुड़ते आ रहे चक्रवृद्धि ब्याज व अन्य शुल्कों को मिलाकर कुल 104 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि अब आवास संघ के खाते में ‘डूबत ऋण’ के रूप में दर्ज हो चुकी है, जिसकी रिकवरी की उम्मीद न के बराबर है।
पुराने लंबित मामलों पर भी कस रहा शिकंजा
रायपुर ईओडब्ल्यू के वरिष्ठ अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि मुख्यमंत्री और शासन के मंशानुसार जांच एजेंसी अब नए मामलों के साथ-साथ दशकों पुराने और लंबित पड़े भ्रष्टाचार के प्रकरणों को भी कड़े वीक्षण के साथ प्राथमिकता के आधार पर निपटा रही है। 30 साल बाद कोर्ट में यह 15,000 पन्नों का विस्तृत चालान पुख्ता वैज्ञानिक और दस्तावेजी सबूतों के साथ पेश किया गया है, ताकि इस वित्तीय अपराध के बूढ़े हो चुके दोषियों को भी कानून के दायरे में लाकर सख्त से सख्त सजा दिलाई जा सके और सरकारी धन के दुरुपयोग पर नजीर पेश की जा सके।






