High Court Landmark Judgment On RTI: एक निजी संगठन ने अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व)-सह-जन सूचना अधिकारी, लैलूंगा के समक्ष एक आरटीआई आवेदन प्रस्तुत किया था. इस आवेदन में संगठन ने पटवारी रामनाथ सिंह के जाति प्रमाण पत्र, निवास प्रमाण पत्र, शैक्षणिक दस्तावेज, हलफनामे और उनके पूरे सर्विस रिकॉर्ड की कॉपियां मांगी थीं.
प्राइवेसी के हनन की आशंका पर पहुंचे कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला
अपनी संवेदनशील और निजी जानकारियों के इस तरह सार्वजनिक रूप से उजागर होने की आशंका को देखते हुए पटवारी रामनाथ सिंह ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की. याचिका में उनके अधिवक्ता द्वारा तर्क दिया गया कि जो दस्तावेज आरटीआई के तहत मांगे गए हैं, वे पूरी तरह से व्यक्तिगत (Personal) हैं. उनका किसी भी प्रकार की सार्वजनिक गतिविधि या व्यापक जनहित से कोई सीधा संबंध नहीं है. अपनी याचिका को मजबूती देने के लिए उन्होंने देश की सर्वोच्च अदालत (सुनील कुमार बनाम भारत संघ व अन्य मामलों में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों) का भी विशेष रूप से हवाला दिया.
हाईकोर्ट का कड़ा रुख:
मामले की गंभीरता को स्वीकार करते हुए माननीय न्यायालय ने माना कि बिना किसी ठोस और प्रमाणित जनहित के, किसी कर्मचारी के नियुक्ति और व्यक्तिगत पहचान से जुड़े दस्तावेजों को सार्वजनिक करना उसकी ‘राइट टू प्राइवेसी’ (निजी स्वतंत्रता के अधिकार) का सीधा उल्लंघन है।
जन सूचना अधिकारियों की मनमानी पर लगेगा अंकुश
हाईकोर्ट के इस नजीर वाले फैसले के बाद अब आरटीआई के नाम पर सरकारी कर्मचारियों को बेवजह परेशान करने और उनके व्यक्तिगत दस्तावेजों की कॉपियां निकालकर दबाव बनाने वाली गतिविधियों पर पूरी तरह से रोक लगेगी. कोर्ट ने साफ कर दिया है कि प्राइवेसी का अधिकार सर्वोपरि है और जब तक कोई आवेदक यह साबित नहीं कर देता कि जानकारी सार्वजनिक करने से समाज का कोई बहुत बड़ा भला होने जा रहा है, तब तक अधिकारी ऐसी किसी भी फाइल को नहीं खोलेंगे. इस फैसले से छत्तीसगढ़ के लाखों शासकीय सेवकों ने राहत की सांस ली है.






