Fake Disability Certificate Scams: गौरी शंकर गुप्ता/घरघोड़ा/रायगढ़: रायगढ़ जिले के औद्योगिक क्षेत्र घरघोड़ा में भ्रष्टाचार की एक ऐसी जड़ें सामने आई हैं, जिसने पूरे सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगा दिया है। विशेष पड़ताल में यह तथ्य उभरकर आया है कि क्षेत्र के कई रसूखदार और रसूख रखने वाले परिवारों के वयक्तियो ने छल-कपट का सहारा लेकर न केवल सरकारी नियमों की धज्जियां उड़ाई हैं, बल्कि उन दिव्यांगों के अधिकारों पर भी डाका डाला है जो वास्तव में इस आरक्षण के हकदार थे।
फर्जीवाड़े का डिजिटल और मेडिकल गठजोड़:
सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, इस पूरे खेल में एक संगठित गिरोह सक्रिय है। संदेह जताया जा रहा है कि जिला मेडिकल बोर्ड के कुछ भ्रष्ट कर्मचारियों और बिचौलियों की मिलीभगत से कूटरचित दस्तावेज तैयार किए गए। कई ऐसे कर्मचारी वर्तमान में विभिन्न शासकीय विभागों और प्रतिष्ठानों में कार्यरत हैं, जो शारीरिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ हैं, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में उन्हें 40 से 60 प्रतिशत तक दिव्यांग दर्शाया गया है। यह न केवल एक धोखाधड़ी है, बल्कि शासन के उस नेक उद्देश्य की हत्या है जो समाज के वंचित वर्गों को मुख्यधारा में लाने के लिए बनाया गया था।
पात्रों का छीना गया अधिकार:
इस फर्जीवाड़े का सबसे दुखद पहलू यह है कि घरघोड़ा और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के असली दिव्यांग युवा आज भी बेरोजगारी का दंश झेल रहे हैं। उनके पास योग्यता और वैध प्रमाण पत्र होने के बावजूद उन्हें अवसर नहीं मिल पा रहा, क्योंकि उनकी जगह पर “कागजी विकलांगों” ने कब्जा कर लिया है। स्थानीय जागरूक नागरिकों का कहना है कि यदि इन संदिग्ध कर्मचारियों की निष्पक्ष मेडिकल जांच किसी अन्य जिले या राज्य स्तरीय मेडिकल बोर्ड से कराई जाए, तो इस महाघोटाले की परतें आसानी से खुल सकती हैं।
प्रशासन को चाहिए कि वे घरघोड़ा क्षेत्र में हुए दिव्यांग कोटे से नियुक्तियों की स्क्रूटनी करे। दोषियों के विरुद्ध तत्काल एफआईआर (FIR) दर्ज कर उन्हें सेवा से बर्खास्त किया जाना चाहिए और उनके द्वारा प्राप्त किए गए वेतन की वसूली भू-राजस्व की भांति की जानी चाहिए।
इस पूरे मामले में शामिल बड़े चेहरों, बिचौलियों और फर्जी कर्मचारियों की सूची के साथ अगला बड़ा खुलासा हमारी अगली न्यूज़ रिपोर्ट में जल्द किया जाएगा। समाचार पर लगातार बने रहें…









