Burhanpur ribal Rain Ritual: इंद्र देव को मनाने का अनोखा जतन; अच्छी बारिश के लिए पत्तों से लिपटे बच्चे और मेंढक लेकर निकले ग्रामीण, सदियों पुरानी परंपरा जीवंत

संवाददाता गोपाल देवकर, बुरहानपुर: मध्य प्रदेश के बुरहानपुर जिले के आदिवासी अंचलों में दुदबोली अमावस्या का पर्व पारंपरिक उत्साह, अटूट श्रद्धा और अनूठी आदिवासी संस्कृति के साथ मनाया गया। आगामी खरीफ सीजन में अच्छी बारिश और भरपूर फसल की कामना को लेकर बच्चों और ग्रामीणों ने गांव-गांव घूमकर इंद्र देव को मनाने की सदियों पुरानी अनूठी परंपरा निभाई। मेंढक की टर्राहट, पारंपरिक लोकगीत और आदिवासी संस्कृति के इस अनूठे संगम ने पूरे ग्रामीण माहौल को उत्सवमय और भक्तिमय बना दिया। यह Tribal Rain Ritual (आदिवासी वर्षा अनुष्ठान) आज भी नई पीढ़ी के लिए कौतूहल और श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है।

क्या है भावई और ठूडी पर्व का महत्व? (Indigenous Culture Festival)

बुरहानपुर के सुदूर आदिवासी क्षेत्रों में दुदबोली अमावस्या पर्व को स्थानीय भाषा में “भावई” और “ठूडी” के नाम से भी जाना जाता है। इस Indigenous Culture Festival (स्वदेशी सांस्कृतिक उत्सव) के पीछे यह प्राचीन मान्यता है कि यह पर्व ठीक मानसून के आगमन से करीब आठ से दस दिन पहले मनाया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य रूठे हुए इंद्र देव को प्रसन्न करना है ताकि समय पर और अच्छी बारिश हो सके।

बाइट— राधा (ग्रामीण): “हम लोग हर साल यह परंपरा निभाते हैं और इंद्र देव से अच्छी बारिश की प्रार्थना करते हैं, ताकि खेतों में अच्छी फसल हो और हमारे परिवारों में खुशहाली आए।”

हरे पत्तों में लिपटा बच्चा और टोकरी में मेंढक (Frog Croaking Tradition)

इस त्योहार का सबसे मुख्य और आकर्षक आकर्षण गांव के छोटे बच्चों की टोली होती है। त्योहार के दिन बच्चे पारंपरिक वेशभूषा और लोकगीतों के साथ टोलियां बनाकर घर-घर निकलते हैं। इस दौरान एक बच्चे को प्राकृतिक रूप से हरे पत्तों से पूरी तरह ढककर सजाया जाता है, जो हरियाली का प्रतीक होता है। वहीं, एक बांस की टोकरी में मेंढक को रखकर बच्चे घर-घर पहुंचते हैं। इस Frog Croaking Tradition (मेंढक टर्राहट परंपरा) के दौरान ग्रामीण बच्चों पर पानी छिड़कते हैं और नेग देते हैं। आदिवासी परंपरा के अनुसार इस नेग में कोई रुपया-पैसा नहीं, बल्कि केवल ‘कच्चा अनाज’ ही स्वीकार किया जाता है।

बाइट— भागा बाई (ग्रामीण): “बचपन से हम यह परंपरा देखते आ रहे हैं। गांव के बच्चे टोकरी में मेंढक लेकर घर-घर जाते हैं और लोग खुशी-खुशी अनाज और दुआएं देते हैं।”

पेड़ के नीचे सामूहिक भोज और विदाई (Community Monsoon Prayer)

गांव के सभी घरों से अनाज इकट्ठा करने के बाद, बच्चों और ग्रामीणों की यह टोली गांव की सीमा से बाहर चली जाती है। वहां किसी बड़े जामुन या आम के पेड़ के नीचे प्राकृतिक माहौल में सामूहिक रूप से भोजन पकाया जाता है। इसके बाद सभी मिलकर इस प्रसादी को ग्रहण करते हैं और मेंढक को सुरक्षित प्रकृति में छोड़ दिया जाता है। इस दौरान पूरा अंचल Community Monsoon Prayer (सामूहिक मानसून प्रार्थना) के रंग में रंगा नजर आता है, जहां हर चेहरे पर खेतों में हरियाली और समृद्धि की उम्मीद होती है।

बाइट— सीमा (बालिका): “हम सब बच्चे मिलकर लोकगीत गाते हैं और पूरे गांव में घूमते हैं। हमें यह त्योहार मनाना बहुत अच्छा लगता है।”

निश्चित रूप से, दुदबोली अमावस्या केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आदिवासी संस्कृति, प्रकृति प्रेम, पर्यावरण संरक्षण और सामूहिक एकता की एक ऐसी जीवंत मिसाल है, जो आज के आधुनिक युग में भी बुरहानपुर के ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी पूरी पहचान के साथ जिंदा है।

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