Richest Indian King: भारत के इतिहास में कई प्रतापी और वैभवशाली राजा हुए हैं, जिन्होंने अपनी ताकत और धन-दौलत से दुनिया को हैरान किया। लेकिन जब बात इतिहास के सबसे अमीर और आर्थिक रूप से शक्तिशाली शासक की आती है, तो इतिहासकार और अर्थशास्त्री मुगल सम्राट अकबर को इस सूची में सबसे शीर्ष पर रखते हैं। हालिया आर्थिक अध्ययनों और ऐतिहासिक दस्तावेजों के विश्लेषण से यह साफ हुआ है कि 16वीं सदी (1556 से 1605) में अकबर के शासनकाल के दौरान मुगल साम्राज्य दुनिया की सबसे बड़ी और समृद्ध अर्थव्यवस्थाओं में से एक था। उस दौर में वैश्विक आर्थिक उत्पादन (ग्लोबल जीडीपी) में अकेले भारत की हिस्सेदारी लगभग 25% यानी दुनिया की कुल संपत्ति का एक-चौथाई हिस्सा थी।
राजा टोडरमल की ‘दहसाला प्रणाली’ से मजबूत हुआ शाही खजाना
अकबर की इस अभूतपूर्व आर्थिक सफलता के पीछे कोई संयोग नहीं, बल्कि एक बेहद सुदृढ़ और दूरदर्शी प्रशासनिक सोच थी। अकबर के वित्त मंत्री राजा टोडरमल ने उस दौर में ऐतिहासिक ‘दहसाला कर प्रणाली’ की शुरुआत की थी। इस क्रांतिकारी व्यवस्था के अंतर्गत भूमि राजस्व (टैक्स) के संग्रह को पूरी तरह से मानकीकृत और पारदर्शी बनाया गया। इस प्रणाली ने न केवल कर प्रशासन में व्यापक सुधार किए और किसानों के लिए फसलों की अनिश्चितता के जोखिम को कम किया, बल्कि सीधे तौर पर शाही खजाने (शाही कोष) में होने वाली नियमित आय को कई गुना बढ़ा दिया। मजबूत कृषि आधारित अर्थव्यवस्था ही मुगलों के आर्थिक वैभव की मुख्य नींव बनी।
कपड़ा, मसाले और रत्न व्यापार से देश में आया रिकॉर्ड सोना-चांदी
वैश्विक व्यापार का स्वर्ण युग: अकबर के कार्यकाल में घरेलू व्यापार के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय वाणिज्य को भी सक्रिय रूप से बढ़ावा दिया गया। मुगल साम्राज्य ने सिल्क रूट के माध्यम से सेंट्रल एशिया, फारस (ईरान) और कई यूरोपीय देशों के व्यापारियों के साथ बेहद मजबूत व्यापारिक संबंध स्थापित किए। भारतीय मलमल (कपड़ा), बहुमूल्य मसाले, कीमती रत्न और विलासिता की वस्तुओं के बदले दुनिया भर के व्यापारी भारतीय बंदरगाहों पर लंगर डालते थे। इसके बदले में बड़ी मात्रा में विदेशी सोना, चांदी और अन्य मूल्यवान धातुएं भारत आईं, जिसने देश को आर्थिक रूप से ‘सोने की चिड़िया’ बनाए रखने में मदद की।
औरंगजेब के समय 27% के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची थी देश की जीडीपी
यद्यपि सदियों पहले के किसी राजा की व्यक्तिगत संपत्ति का आज के मानदंडों पर सटीक आकलन करना बेहद कठिन है, फिर भी आर्थिक इतिहासकारों का अनुमान है कि अकबर के खजाने, उपजाऊ भूमि और शाही संपत्तियों का कुल मूल्य आज के हिसाब से कई खरब डॉलर (ट्रिलियन डॉलर) के बराबर ठहरता है। अकबर के बाद आए मुगल शासकों ने भी इसी समृद्धि को बरकरार रखा। शाहजहां के काल में जहां कला-संस्कृति और बेशकीमती ‘मयूर सिंहासन’ (तख्त-ए-ताऊस) का निर्माण हुआ, वहीं औरंगजेब के शासनकाल में साम्राज्य का भौगोलिक विस्तार अपने चरम पर था। अर्थशास्त्रियों के अनुसार, औरंगजेब के समय वैश्विक जीडीपी में भारत की हिस्सेदारी बढ़कर 25% से 27% के बीच पहुंच गई थी, जो इतिहास में किसी भी एक साम्राज्य का दुनिया के कुल संसाधनों पर सबसे बड़ा नियंत्रण दर्शाता है।









