Solar Energy Future: नई दिल्ली। दुनिया भर में क्लीन और ग्रीन एनर्जी के सबसे बड़े स्रोत के रूप में उभर रहे सौर ऊर्जा (सोलर पावर) क्षेत्र से एक बेहद क्रांतिकारी और बड़ी खबर सामने आई है। वैज्ञानिकों ने सोलर पैनलों की कार्यक्षमता (एफिशिएंसी) को बढ़ाने और उन्हें अधिक किफायती बनाने का एक बेहद आसान व नया तरीका ढूंढ निकाला है। इस नई खोज की मदद से अब बहुत कम सोलर पैनल लगाकर भी पहले की तुलना में कहीं ज्यादा बिजली (सोलर एनर्जी) का उत्पादन करना पूरी तरह से मुमकिन हो पाएगा। वैज्ञानिकों की इस खोज से आने वाले समय में घरेलू और औद्योगिक दोनों ही स्तरों पर बिजली संकट से निपटने में बड़ी मदद मिलने की उम्मीद है।
क्या है ‘Perovskite-Silicon Tandem’ तकनीक और कैसे करती है काम?
मौसम और तकनीकी विशेषज्ञों के अनुसार, इस नई दिशा में ‘पेरोव्स्काइट-सिलिकॉन टैंडम’ (Perovskite–Silicon Tandem) सोलर सेल तकनीक को वर्तमान में सबसे कारगर और शक्तिशाली माना जा रहा है। इस आधुनिक तकनीक में दो अलग-अलग प्रकार के लाइट एब्जॉर्बिंग (प्रकाश सोखने वाले) मैटेरियल्स का एक साथ इस्तेमाल किया जाता है, जो सूर्य की रोशनी से अधिकतम ऊर्जा खींचने में सक्षम होते हैं। यह पारंपरिक सिलिकॉन सोलर पैनल के मुकाबले कई गुना अधिक प्रभावी है। इसकी कार्यप्रणाली की बात करें तो यह तकनीक सूर्य की किरणों को अलग-अलग एनर्जी रेंज में बांट देती है। इसमें ‘पेरोव्स्काइट’ से बनी सबसे ऊपरी परत (टॉप लेयर) सूरज की हाई-एनर्जी वाली ब्लू और अल्ट्रा वायलेट लाइट को सोखती है, जबकि इसके ठीक नीचे लगी ‘सिलिकॉन लेयर’ कम एनर्जी वाली रेड और इंफ्रारेड लाइट को सोख लेती है। इस तरह दोनों परतें मिलकर दोगुनी ऊर्जा पैदा करती हैं।
वैज्ञानिकों ने दूर की मास प्रोडक्शन (बड़े पैमाने पर उत्पादन) की बाधा
यूं तो यह तकनीक पहले से मौजूद थी, लेकिन इसके व्यावसायिक स्तर पर बड़े पैमाने पर उत्पादन (मास प्रोडक्शन) में एक बहुत बड़ी समस्या आ रही थी। सिलिकॉन की सतह पर पेरोव्स्काइट की बेहद पतली कोटिंग करने में अत्यधिक समय और जटिल विनिर्माण प्रक्रिया लगती थी। इस बड़ी बाधा को दूर करने के लिए वैज्ञानिकों ने अब ‘क्लोज-स्पेस सबलिमेशन’ (Close-Space Sublimation) की पारंपरिक प्रक्रिया में बड़ा सुधार किया है। इस नई पद्धति में सॉलिड प्रीकर्सर मैटेरियल को तब तक गर्म किया जाता है, जब तक वह भाप (वेपर) में तब्दील न हो जाए। भाप बनते ही यह कुछ ही दूरी पर स्थित सिलिकॉन सरफेस पर जाकर चिपक जाता है और एक त्वरित केमिकल रिएक्शन के जरिए पेरोव्स्काइट की एक समान और सटीक लेयर बना देता है। इस पूरी प्रक्रिया में किसी भी प्रकार के लिक्विड सॉल्वेंट (तरल रसायन) की जरूरत नहीं पड़ती, जिससे यह पर्यावरण के अनुकूल (क्लीन) और बेहद किफायती साबित हो रही है।
सिर्फ 10 मिनट में होगी कोटिंग, 34 प्रतिशत तक पहुंच जाएगी कार्यक्षमता
इस प्रोजेक्ट से जुड़े मुख्य रिसर्चर्स ने बताया कि सुधारी गई यह नई प्रक्रिया इतनी तेज है कि इसकी रफ्तार ने स्वयं वैज्ञानिकों को भी हैरत में डाल दिया है। पेरोव्स्काइट लेयर को सिलिकॉन सरफेस पर पूरी तरह से स्थापित होने में अब सिर्फ 10 मिनट का समय लग रहा है, जो इस पूरी खोज की सबसे बड़ी सफलता है। यह तकनीक सिलिकॉन के सभी प्रकार के सरफेस— जैसे स्मूद, नैनो-टेक्सचर्ड और माइक्रो-टेक्सचर्ड— पर समान रूप से और प्रभावी ढंग से काम करती है। विभिन्न वैज्ञानिक रिपोर्ट्स के अनुसार, इस विधि से तैयार किए गए सोलर सेल्स की कार्यक्षमता (एफिशिएंसी) सीधे 34 प्रतिशत तक जा सकती है, जो आज बाजार में व्यावसायिक रूप से मिल रहे किसी भी आम सोलर पैनल की तुलना में बहुत अधिक है। इस अद्भुत खोज का सीधा लाभ यह होगा कि उपभोक्ताओं को अपने घरों की छतों पर भारी-भरकम और ज्यादा संख्या में पैनल लगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी, बल्कि चंद पैनल ही उनकी जरूरत की पूरी बिजली आसानी से बना देंगे।









