सिंगरौली: जिले में स्वास्थ्य व्यवस्था की तस्वीर दिन-ब-दिन चिंताजनक होती जा रही है। आदिवासी बहुल क्षेत्रों में झोलाछाप डॉक्टर खुलेआम लोगों की जान से खिलवाड़ कर रहे हैं, जबकि जिम्मेदार अधिकारी नाक में दम किए बैठे हैं।
स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, कोलकाता, दिल्ली और अन्य राज्यों से आए कथित डॉक्टर बिना किसी डिग्री, पंजीकरण या पहचान पत्र के मरीजों का इलाज कर रहे हैं। इनके क्लिनिक पर न कोई बीमारी का बैनर है और न ही चिकित्सा पद्धति का प्रमाण, फिर भी ये गंभीर बीमारियों का इलाज करने का दावा करते हैं।
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झोलाछाप डॉक्टरों का दावा:
ग्रामीणों ने बताया कि ये डॉक्टर खुद को एमबीबीएस या विशेषज्ञ डॉक्टरों से बेहतर बताते हैं। पेट दर्द से लेकर गंभीर हृदय रोग तक, सभी मरीजों के लिए इन्हीं के ‘एक ही इलाज’ की दवा और इंजेक्शन होते हैं। इससे न केवल चिकित्सा विज्ञान की अवमानना होती है, बल्कि मरीजों की जान पर भी खतरा पैदा होता है।
जिम्मेदार अधिकारियों की चुप्पी:
स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों और बीएमओ पंकज सिंह को इस मामले की जानकारी दी गई, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। ग्रामीणों का आरोप है कि अधिकारी झोलाछाप डॉक्टरों के क्लिनिक पर जाते हैं, लेकिन केवल औपचारिकता पूरी कर लौट आते हैं।
झोलाछाप डॉक्टरों का नेटवर्क:
स्थानीय लोगों का कहना है कि ये डॉक्टर पूरे जिले में फैला नेटवर्क चला रहे हैं। उनके आने और काम करने की जानकारी किसी को नहीं है, लेकिन उनका असर शासन-प्रशासन तक दिखता है।
आदिवासी जनता सबसे अधिक प्रभावित:
दूरस्थ क्षेत्रों में सरकारी स्वास्थ्य सुविधा का अभाव है। झोलाछाप डॉक्टर सस्ते इलाज और तुरंत आराम का लालच देकर आदिवासी जनता को अपने जाल में फंसाते हैं। कई बार गलत दवा और इंजेक्शन से मरीजों की हालत बिगड़ जाती है।
कलेक्टर पर टिकी निगाहें:
जिले में स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही से नाराज जनता अब जिला कलेक्टर से उम्मीद लगाए बैठी है। लोग चाहते हैं कि कलेक्टर पूरे मामले की गंभीरता से जांच करें और झोलाछाप डॉक्टरों के साथ-साथ उन्हें संरक्षण देने वाले अधिकारियों पर भी कार्रवाई करें।
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सवाल बड़ा है:
जब राज्य सरकार स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करने और जनता तक बेहतर इलाज पहुंचाने का दावा करती है, तब सिंगरौली में आदिवासी जनता की जिंदगी आखिर किसके भरोसे है? क्या जिला प्रशासन जागेगा, या आदिवासी जनता झोलाछाप डॉक्टरों की लापरवाही का शिकार होती रहेगी?











