Pati Nahi Jewar Chahiye: ‘जब तक गहने वापस नहीं आएंगे, घर नहीं लौटूंगा’… रीवा में दो भैंसों के चक्कर में कैसे बिखर गया हंसता-खेलता परिवार!

VIKASH KHALKHO

रीवा। Nishaanebaz.com-Rewa Dairy Scheme Dispute: सरकारी योजनाएं देश के किसानों और ग्रामीण परिवारों को आर्थिक रूप से संबल प्रदान करने के लिए चलाई जाती हैं, लेकिन जब इन्हीं योजनाओं के क्रियान्वयन में भारी लापरवाही और महीनों की लेटलतीफी होती है, तो इसका खामियाजा गरीब परिवारों को मानसिक, आर्थिक और सामाजिक रूप से भुगतना पड़ता है। मध्य प्रदेश की महत्वाकांक्षी ‘डेयरी प्लस योजना’ के तहत दो भैंस पाने की उम्मीद में रीवा जिले के एक ग्रामीण ने अपनी पत्नी के गहने तक गिरवी रख दिए, लेकिन 10 महीने बीत जाने के बाद भी जब पशु नहीं मिले, तो स्थिति इतनी बिगड़ गई कि पूरा परिवार बिखरने की कगार पर पहुंच गया।

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भैंस मिलने की उम्मीद में गिरवी रख दिए पत्नी के जेवर

रीवा जिले के महौता निवासी अंगिरा पांडे ने पशुपालन कर खुद को आत्मनिर्भर बनाने के लिए डेयरी प्लस योजना के तहत आवेदन किया था। योजना के नियमों के अनुसार उन्होंने 1 लाख 47 हजार रुपये की राशि भी जमा कर दी। इतनी बड़ी रकम जुटाने के लिए उन्हें अपनी पत्नी के सोने-चांदी के गहने तक साहूकारों के पास गिरवी रखने पड़े। अंगिरा को उम्मीद थी कि कुछ ही हफ्तों में सरकारी मदद से दो भैंसें मिल जाएंगी, जिससे दूध बेचकर परिवार की माली हालत सुधर जाएगी और वे आराम से गहने छुड़ा लेंगे। लेकिन, देखते-देखते 10 महीने गुजर गए, न तो भैंसें आईं और न ही विभाग की तरफ से कोई ठोस जवाब मिला।

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झोपड़ी में रहने को मजबूर हुआ पति, परिवार में छिड़ी कलह

जिस योजना से परिवार की खुशहाली के सपने देखे जा रहे थे, वही अब पति-पत्नी के बीच बड़े विवाद की वजह बन गई है। पत्नी का लगातार दबाव था कि जब तक गहने वापस नहीं आते, तब तक सुकून नहीं मिल सकता। बात इतनी बढ़ गई कि हालात खराब होने पर अंगिरा पांडे अपना घर छोड़कर पास ही खेत में बनी एक छोटी सी झोपड़ी में अकेले रहने को मजबूर हो गए। बेटी ने भी मीडिया को बताया कि माता-पिता के बीच गहनों और पैसों को लेकर लगातार झगड़े होने लगे, जिसके बाद दोनों अलग-अलग रहने लगे हैं। इस स्थिति को देखकर गांव के अन्य लोगों ने भी इस योजना से तौबा करना शुरू कर दिया है।

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विस्तार न्यूज़ की पड़ताल और प्रशासन का आश्वासन

मामले की गंभीरता को समझते हुए जब मीडिया टीम पशुपालन विभाग के उपसंचालक के पास पहुंची, तो अधिकारी ने माना कि योजना के तहत पशु उपलब्ध कराने में देरी हुई है। उनका तर्क था कि भैंसें हरियाणा से लाई जाती हैं और ठेकेदार एक बार में कम से कम 5 हितग्राहियों (यानी 10 पशुओं) की संख्या पूरी होने पर ही गाड़ी लेकर आता है, इसी वजह से लंबा इंतजार करना पड़ा। हालांकि, मीडिया और जनचर्चा के दबाव के बाद मुख्य पशुपालन अधिकारी ने अब यह आश्वासन दिया है कि अगले 15 दिनों के भीतर अंगिरा पांडे को दोनों भैंसें उपलब्ध करा दी जाएंगी। सवाल यह है कि यदि प्रशासनिक प्रक्रियाओं में समय लगता है, तो समय पर सही जानकारी न देने और एक परिवार की गृहस्थी उजाड़ने की जिम्मेदारी किसकी होगी?

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विकास कुमार खलखो एक डिजिटल पत्रकार, समाचार संपादक और SEO कंटेंट क्रिएटर हैं, जिन्हें पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में एक दशक से अधिक का अनुभव है। उन्होंने BJMC, Master of Journalism (MJ) और M.Phil. (मीडिया स्टडीज़) की डिग्री हासिल की है और दबंग दुनिया, हमर छत्तीसगढ़ योजना, हरिभूमि, सन स्टार डेली न्यूज़ और छत्तीसगढ़ की आवाज़ जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों के साथ काम किया है। उन्हें हिंदी पत्रकारिता, ब्रेकिंग न्यूज़ कवरेज, SEO-फ्रेंडली कंटेंट राइटिंग, डिजिटल पब्लिशिंग, कंटेंट स्ट्रैटेजी, थंबनेल डिज़ाइन और सोशल मीडिया मैनेजमेंट में विशेष महारत हासिल है। उनका उद्देश्य सटीक, निष्पक्ष और विश्वसनीय पत्रकारिता के माध्यम से पाठकों तक प्रभावशाली समाचार पहुँचाना और साथ ही उच्च गुणवत्ता वाला डिजिटल कंटेंट तैयार करना है।
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