अंकित वाईकर/छिंदवाड़ा : छिंदवाड़ा जिले के जमुनिया गांव में दशहरा पर एक अनूठी परंपरा देखने को मिलती है। यहां बीते करीब दो दशकों से रावण का दहन नहीं किया जाता, बल्कि उसकी प्रतिष्ठा और पूजा की जाती है।
गांव के आदिवासी समाज रावण को पूर्वज और प्रकृति का संरक्षक मानते हैं। दशहरा से पहले दस दिनों तक विधिपूर्वक रावण की प्रतिमा स्थापित की जाती है और पूजा-अर्चना की जाती है। दशहरा के दिन प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है।
Read More : BIHAR News : बिहार चुनाव से पहले अमित शाह ने दी ‘चार दीपावली’ की घोषणा, BJP ने चुनावी प्रचार शुरू किया
गांव के बुजुर्ग केवलराम परतेती बताते हैं कि रावण केवल पौराणिक पात्र नहीं थे, बल्कि प्रकृति के पंचतत्व — अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी और आकाश — के उपासक थे। केवलराम परतेती ने कहा,
“हमारे समाज की मूल मान्यता प्रकृति पूजा में निहित है और रावण भी इन्हीं सिद्धांतों का पालन करता था। वह रक्ष संस्कृति का प्रतीक था, इसलिए हम उसे सम्मानपूर्वक पूजते हैं।”
उन्होंने आगे बताया कि पहले यह पूजा घरों तक सीमित रहती थी, लेकिन अब इसे सार्वजनिक रूप से भी करने की अनुमति मिल गई है। इसका उद्देश्य समाज में रावण दहन के विरोध को सामने लाना और रावण के प्रति सम्मान स्थापित करना है।
“हमने प्रशासन से अनुरोध किया है कि रावण दहन पर विचार किया जाए। हमारे गांव में बीते 20 वर्षों से दहन नहीं किया जाता, और हम अन्य समुदायों से भी यही अपेक्षा रखते हैं,” केवलराम परतेती ने कहा।











