Corruption in Gram Panchayat : विशेष रिपोर्ट: कागजों में सिमटा ‘पंचायती राज’, घरघोड़ा जनपद में ग्राम स्वराज का सपना हो रहा चकनाचूर

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Corruption in Gram Panchayat : गौरी शंकर गुप्ता/घरघोड़ा। पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी का सपना था कि सत्ता के विकेंद्रीकरण से ग्रामीण क्षेत्रों और आदिवासी अंचलों का विकास हो, लेकिन घरघोड़ा जनपद क्षेत्र में पंचायती राज की परिकल्पना दम तोड़ती नजर आ रही है। संवैधानिक अधिकारों और 50 प्रतिशत महिला आरक्षण के बावजूद, धरातल पर पंचायतें केवल भ्रष्टाचार और निष्क्रियता का केंद्र बनकर रह गई हैं।

अधिकारों की होड़, कर्तव्यों से मुख मोड़

पंचायती राज अधिनियम के तहत ग्राम प्रशासन की पूरी जिम्मेदारी पंचायतों को सौंपी गई है, लेकिन वर्तमान में ‘पंच परमेश्वर’ अपने अधिकारों के प्रति जितने सजग हैं, कर्तव्यों के प्रति उतने ही उदासीन। आलम यह है कि न तो समय पर पंचायत की बैठकें होती हैं और न ही नियमों के अनुसार ग्राम सभाओं का आयोजन किया जा रहा है। शासन की महत्वपूर्ण योजनाएं ग्रामीणों तक पहुँचने से पहले ही दम तोड़ रही हैं।

जनप्रतिनिधि मालामाल, ग्रामीण बेहाल

तहसील क्षेत्र की ग्राम पंचायतों में निजी लाभ के लिए शासकीय राशि का दुरुपयोग एक आम बात हो गई है। ग्रामीणों की सरपंचों से शिकायतों का अंबार लगा है:

  • मूलभूत सेवाओं का अभाव: पात्र हितग्राहियों के राशन कार्ड नहीं बन रहे, गरीबी रेखा (BPL) सूची में नाम जुड़वाने के लिए ग्रामीण भटक रहे हैं।

  • पेंशन और मजदूरी में देरी: विकलांग और निराश्रित पेंशन के लिए पात्र लोग कार्यालयों के चक्कर काट रहे हैं, वहीं पंचायतों में काम करने वाले मजदूरों को समय पर मजदूरी नहीं मिल रही।

  • शासकीय राशि का गबन: सरकारी धन के बंदरबांट से ग्रामीणों में भारी रोष है। स्थिति यह है कि जनता अब अपने प्रतिनिधियों को दोबारा मौका न देने का मन बना चुकी है।

योजनाओं का बुरा हाल: ‘सचिवालय’ से ‘वाचनालय’ तक सब फेल

सरकारें आती-जाती रहीं, लेकिन योजनाओं का हश्र नहीं बदला:

  • ग्रामीण सचिवालय: भाजपा सरकार ने ग्रामीणों की समस्या गांव में ही सुलझाने के लिए ‘ग्रामीण सचिवालय’ शुरू किया था, लेकिन विभागीय अमले और प्रतिनिधियों की अरुचि के कारण यह योजना ठंडे बस्ते में चली गई।

  • वाचनालयों पर दीमक का पहरा: कांग्रेस शासन में ज्ञानवर्धक पुस्तकों के साथ ‘ज्ञानोदय वाचनालय’ शुरू हुए। भाजपा सरकार ने नाम बदलकर ‘स्वामी आत्मानंद वाचनालय’ कर दिया, लेकिन केवल नाम बदलने से सुधार नहीं आया। लाखों की पुस्तकें आज ग्रामीणों के हाथ में होने के बजाय दीमकों का आहार बन रही हैं।

प्रशासनिक गंभीरता पर सवाल

महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज और संविधान के नीति-निर्देशक सिद्धांतों की धज्जियां उड़ती देख भी प्रशासन मौन है। पंचायतों के सशक्तिकरण को लेकर न तो जिला प्रशासन गंभीर दिख रहा है और न ही स्थानीय जनपद अमला। जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक ‘पंचायती राज’ केवल कागजी दस्तावेजों और नारों तक ही सीमित रहेगा।

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