C.G High Court News : छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का बड़ा फैसला! किराया नहीं तो बेदखली तय…

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बिलासपुर: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की डबल बेंच ने रायगढ़ जिले से जुड़े एक पुराने संपत्ति और किराया विवाद में अहम निर्णय सुनाते हुए स्पष्ट संदेश दिया है कि बकाया किराया समय पर जमा नहीं करने वाले किरायेदारों को कानून अनंत संरक्षण नहीं देता। न्यायमूर्ति रंजनी दुबे और न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद की खंडपीठ ने किराया नियंत्रण प्राधिकरण के आदेश को बहाल करते हुए अपीलीय प्राधिकरण के फैसले को निरस्त कर दिया।यह फैसला WPC 1492/2023 – क्रेश गायत्री देवी अग्रवाल एवं अन्य बनाम निर्मला देवी सिंघानिया एवं अन्य प्रकरण में दिया गया।

क्या है पूरा मामला
विवाद रायगढ़ जिले के ग्राम बैकुंठपुर स्थित खसरा नंबर 141/1/1 (रकबा 0.541 हेक्टेयर) की भूमि और कोतरा रोड स्थित लकड़ी टाल परिसर से जुड़ा है। लंबे समय से किराया भुगतान नहीं होने को लेकर यह मामला किराया नियंत्रण प्राधिकरण से लेकर हाई कोर्ट तक पहुंचा।

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हाई कोर्ट ने क्यों पलटा अपीलीय आदेश
किराया नियंत्रण प्राधिकरण, रायगढ़ ने 25 मार्च 2022 को किरायेदार के खिलाफ आदेश पारित किया था। इसके खिलाफ दायर अपील में रायपुर स्थित किराया न्यायाधिकरण ने 20 दिसंबर 2022 को मूल आदेश को निरस्त कर दिया था।हाई कोर्ट ने अपीलीय न्यायाधिकरण के इस फैसले को कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण मानते हुए खारिज कर दिया और मूल आदेश को पुनः प्रभावी कर दिया।

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चार सप्ताह का अंतिम मौका
हाई कोर्ट ने किरायेदार को चार सप्ताह के भीतर संपूर्ण बकाया किराया जमा करने का अंतिम अवसर दिया है। कोर्ट ने साफ कहा कि यदि तय समय में भुगतान नहीं हुआ, तो यह मौका स्वतः समाप्त मान लिया जाएगा।

दो महीने में बेदखली प्रक्रिया पूरी करने के निर्देश
न्यायालय ने यह भी निर्देश दिया कि किराया जमा न होने की स्थिति में संबंधित प्राधिकरण छत्तीसगढ़ किराया नियंत्रण अधिनियम, 2016 की धारा 7 के तहत किरायेदार की बेदखली और किराया वसूली की पूरी प्रक्रिया दो माह के भीतर पूरी करे।

याचिकाकर्ता की ओर से रखे गए तर्क
याचिकाकर्ता गायत्री देवी की ओर से अधिवक्ता मतीन सिद्दिकी ने पक्ष रखा। कोर्ट ने उनके तर्कों से सहमति जताते हुए कहा कि लगातार किराया न देने वाले किरायेदारों को कानून के नाम पर संरक्षण देना न्यायसंगत नहीं है।

कानूनी दृष्टि से क्यों अहम है यह फैसला
यह निर्णय स्पष्ट करता है कि किराया नियंत्रण कानून केवल किरायेदारों की सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि मकान मालिकों के अधिकारों की रक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यह फैसला भविष्य में लंबित किराया विवादों के लिए एक मजबूत मिसाल बन सकता है।

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