Sarangkheda Chetak Festival : बड़वानी/सारंगखेड़ा। महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश की सीमा पर स्थित सारंगखेड़ा में चल रहे पारंपरिक अश्व मेले और चेतक महोत्सव में इस बार मध्य प्रदेश की एक घोड़ी ‘रूद्राणी’ आकर्षण का मुख्य केंद्र बनी हुई है। बड़वानी जिले के खेतिया से सटे इस क्षेत्र में आयोजित मेले में 22 महीने की इस घोड़ी की कीमत ₹1 करोड़ 27 लाख आंकी गई है, जिसकी चर्चा अश्व प्रेमियों और मेले में आए दर्शकों के बीच जोरों पर है। यह कीमत ही रूद्राणी को इस साल के मेले का सबसे बड़ा आकर्षण बना रही है।
Sarangkheda Chetak Festival : सारंगखेड़ा में आयोजित यह अश्व मेला और चेतक महोत्सव एक विशेष उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। खेतिया से लगभग 20 किलोमीटर दूर, मेला क्षेत्र भव्य रोशनी से जगमगा रहा है, जिसमें झूले, दुकानें, पारंपरिक सजावट और घोड़ों की विशाल प्रदर्शनी ने उत्सव का माहौल बना दिया है। दत्त जयंती के उपलक्ष्य में दत्त मंदिर को भी आकर्षक रूप से सजाया गया है, जहां हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुँच रहे हैं। हालांकि, इस मेले की सबसे बड़ी पहचान अब मध्य प्रदेश के महेश्वर से आए घोड़ी मालिक राजेंद्र यादव की ‘रूद्राणी’ बनी है।
Sarangkheda Chetak Festival : जैसे ही ‘रूद्राणी’ ने प्रदर्शन मैदान में प्रवेश किया, दर्शक उसकी एक झलक पाने के लिए उमड़ पड़े। लगभग 165 सेंटीमीटर ऊंची, दमदार काया, खूबसूरत चाल और राजसी व्यक्तित्व वाली मारवाड़ी नस्ल की यह घोड़ी हर किसी का मन मोह रही है। अश्व प्रेमियों और विशेषज्ञों का मानना है कि ‘रूद्राणी’ की भव्यता और नूकरी प्रजाति का मिश्रण इसे खास बनाता है, जिस पर से नजरें हटाना मुश्किल हो जाता है।
Sarangkheda Chetak Festival : घोड़ी के मालिक, महेश्वर निवासी राजेंद्र यादव, जो पिछले चार सालों से लगातार इस मेले में आ रहे हैं, इस बार मारवाड़ी और नूकरी प्रजाति के कुल 22 घोड़े लेकर पहुंचे हैं। यादव ने जानकारी दी कि उनकी ‘रूद्राणी’ जब केवल 21 महीने की थी, तब राजस्थान के प्रसिद्ध पुष्कर मेले में उसकी कीमत ₹1 करोड़ 27 लाख लगाई गई थी, लेकिन उन्होंने उसे बेचने से मना कर दिया था। 22 महीने की हो चुकी ‘रूद्राणी’ आज भी मालिक के लिए अनमोल है।
Sarangkheda Chetak Festival : राजेंद्र यादव ने सारंगखेड़ा मेले को भारत का सबसे बड़ा और अनूठा चेतक फेस्टिवल मेला बताया। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनका फिलहाल ‘रूद्राणी’ को बेचने का कोई इरादा नहीं है, और उनके अस्तबल में और भी नए, विशिष्ट घोड़े आने वाले हैं। ‘रूद्राणी’ की मौजूदगी ने इस पारंपरिक मेले में एक नया आयाम जोड़ दिया है और अश्व व्यापार तथा अश्व प्रेम के प्रति लोगों की दीवानगी को प्रदर्शित किया है।











