CG News : रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजधानी में शहरी और ग्रामीण गरीब तबके तक सीधे स्वास्थ्य सेवाएँ पहुँचाने के लिए शुरू की गईं मोबाइल मेडिकल यूनिटें (MMU) इन दिनों खुद अव्यवस्था की शिकार हो गई हैं। जिन बसों से लोगों को उनके मोहल्लों और चौक-चौराहों पर इलाज मिलना था, उनमें अब डॉक्टरों और दवाओं की कमी साफ देखने को मिल रही है।
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CG News : शानदार उद्देश्य से हुई थी शुरुआत
नवंबर 2020 में शुरू हुई ‘मुख्यमंत्री शहरी स्लम स्वास्थ्य योजना’ और ‘दाई-दीदी मोबाइल क्लीनिक’ (महिलाओं के लिए) का मुख्य उद्देश्य यही था कि लोग बिना लंबी दूरी तय किए या सरकारी अस्पताल जाए, अपने ही इलाके में ओपीडी, जांच और मुफ्त दवा जैसी बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएँ पा सकें।
बढ़ता उपयोग: वर्ष 2025 में अब तक डेढ़ लाख से अधिक लोगों का ओपीडी MMU के माध्यम से किया गया है। इसके अलावा, 30 हजार से अधिक लोगों की खून समेत अन्य जांचें की गईं और 1.3 लाख से अधिक मरीजों को मुफ्त दवा वितरित की गई है। ये आंकड़े बताते हैं कि लोगों के लिए इन यूनिटों की जरूरत लगातार बनी हुई है।
निर्धारित सेटअप और जमीनी हकीकत
नियमों के अनुसार, हर मोबाइल मेडिकल यूनिट में पाँच सदस्यीय टीम होना अनिवार्य है, जिसमें एक डॉक्टर, एक नर्स, एक फार्मासिस्ट, एक लैब टेक्नीशियन और एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी शामिल होते हैं।
डॉक्टरों का संकट: जमीनी हकीकत यह है कि वर्तमान में कई मोबाइल मेडिकल यूनिटों में डॉक्टर ही नहीं हैं।
नर्सों के भरोसे ओपीडी: डॉक्टरों की अनुपस्थिति में नर्सों और अन्य स्टाफ ही ओपीडी और दवा वितरण का काम संभाल रहे हैं।
मोहल्लों, बस्तियों और बाजारों में पहुंचने वाली इन वैनों से रोजाना हजारों लोगों को राहत मिल रही है, लेकिन डॉक्टर न होने की स्थिति में मरीजों को केवल प्राथमिक जांच और दवा वितरण तक ही सीमित सेवाएँ मिल पा रही हैं, जिससे स्वास्थ्य सेवा के विस्तार का उद्देश्य अधूरा रह जाता है।













