Burhanpur News : बुरहानपुर/गोपाल देवकर। बुरहानपुर जिले के भोलाना गांव की शासकीय प्राथमिक ईजीएस स्कूल में शिक्षा की हालत इतनी बदतर है कि यह किसी चेतावनी से कम नहीं। जर्जर भवन, शिक्षकों की मनमानी और बच्चों की पढ़ाई के नाम पर लापरवाही की पराकाष्ठा—यहां की हकीकत बयां करती है कि प्राथमिक शिक्षा को लेकर कितनी गंभीरता बरती जा रही है।
Burhanpur News : जर्जर स्कूल, कबाड़ भरा कमरा, और बच्चों से भरी तंग कक्षा
Burhanpur News : स्कूल में महज दो कमरे हैं। एक में कबाड़ और भंगार भरा पड़ा है तो दूसरे कमरे में पहली से पांचवीं तक की पांचों कक्षाओं के 50 से ज्यादा बच्चों को ठूंस-ठूंसकर बैठाया गया है। उमस और गर्मी में बच्चों का वहां बैठना तक मुश्किल है, जिससे उनकी तबीयत भी बिगड़ सकती है।
Burhanpur News : शिक्षकों की मनमानी, बच्चों के भरोसे चल रही कक्षाएं
Burhanpur News : स्कूल में सिर्फ दो शिक्षक हैं, जिनमें से एक अक्सर अनुपस्थित रहते हैं। आवेदन देकर छुट्टी ले ली जाती है और यदि कोई पूछे तो अगले दिन नया कारण बना दिया जाता है। हमारी टीम जब मौके पर पहुंची तो कक्षा में कोई शिक्षक मौजूद नहीं था—बल्कि एक नन्ही बच्ची दूसरी कक्षाओं के बच्चों को पढ़ा रही थी।
Burhanpur News : आंगनबाड़ी के बच्चों को बैठाकर बढ़ाई उपस्थिति
Burhanpur News : सूत्रों के अनुसार, जैसे ही शिक्षक को मीडिया टीम के आने की भनक लगी, पास की आंगनबाड़ी के बच्चों को स्कूल में बैठा दिया गया ताकि उपस्थिति दिखाई जा सके। जब टीम ने पड़ताल की, तो पाया कि दर्ज संख्या 48 थी लेकिन कक्षा में 55 बच्चे मौजूद थे। पूछने पर कहा गया कि कई बच्चों का अब तक एडमिशन नहीं हुआ है क्योंकि उनके समग्र आईडी और आधार कार्ड नहीं हैं।
Burhanpur News : मिड-डे मील और साफ-सफाई में भी भारी लापरवाही
Burhanpur News : शाला परिसर में गंदगी का अंबार है, मूलभूत सुविधाओं का अभाव है और बच्चों को मेन्यू के अनुसार भोजन भी नहीं मिलता। इससे बच्चों की सेहत पर भी बुरा असर पड़ रहा है।
Burhanpur News : जिला शिक्षा अधिकारी का दावा – सुधार होगा
Burhanpur News : जब जिला शिक्षा अधिकारी संतोष सिंह सोलंकी से इस बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि जहां भी ऐसी कक्षाएं जर्जर भवन में चल रही हैं, वहां जल्द सुधार या भवन निर्माण कर कक्षाओं को स्थानांतरित किया जाएगा।
Burhanpur News : अंत में बड़ा सवाल
Burhanpur News : क्या वाकई स्कूल शिफ्ट होगा? क्या बच्चों को मूलभूत सुविधाएं मिलेंगी? या फिर एक बार फिर फाइलों में दब जाएगा गांव के मासूमों का भविष्य?













