Monday, September 21, 2026
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लैब में तैयार हुई चमत्कारिक बछिया, पहाड़ की शान ‘बद्री गाय’ को मिली एक नई जिंदगी!

Animal Husbandry: क्या आपने कभी सोचा है कि टेस्ट ट्यूब या लैब की मदद से किसी पहाड़ी गाय की नस्ल को बचाया जा सकता है? जी हाँ, उत्तराखंड के पहाड़ों से एक बहुत ही बेहतरीन और सुकून देने वाली खबर सामने आई है। वैज्ञानिकों ने चमत्कार कर दिखाया है! लैब में तैयार भ्रूण (Embryo) के जरिए पहली बार ‘बद्री’ नस्ल की एक स्वस्थ बछिया का जन्म हुआ है। पहाड़ की यह अनमोल देसी नस्ल अब लुप्त होने की कगार से बाहर आने की उम्मीद जगा रही है। आइए जानते हैं कि वैज्ञानिकों ने यह कमाल कैसे कर दिखाया और यह बछिया इतनी खास क्यों है।

कैसे हुआ यह अनोखा चमत्कार?

यह पूरी प्रक्रिया किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है, जिसे वैज्ञानिकों ने अपनी मेहनत से सच कर दिखाया:

• अंडाणु निकालना: सबसे पहले वैज्ञानिकों ने एक स्वस्थ बद्री दानदाता गाय से अल्ट्रासाउंड की मदद से सुरक्षित तरीके से अंडाणु (Oocytes) निकाले।

• प्रयोगशाला में निषेचन: इन अंडाणुओं का मिलन बद्री सांड के वीर्य के साथ लैबोरेटरी में कराया गया, जो उत्तराखंड पशुधन विकास बोर्ड से प्राप्त हुआ था।

• सरोगेट माँ का सहारा: तैयार भ्रूण को एक साहीवाल गाय के गर्भ में स्थापित किया गया। यानी जन्म देने वाली माँ साहीवाल थी, लेकिन बछिया के असली माता-पिता बद्री गाय और साहीवाल का गर्भ हैं!

• सावधानी और देखभाल: पिछले कई महीनों तक वैज्ञानिकों की पूरी टीम ने गर्भवती गाय की कड़ी निगरानी की, और आखिरकार 11 सितंबर को इस प्यारी सी बछिया ने इस दुनिया में कदम रखा।

तीन साल की कड़ी मेहनत का नतीजा

यह सफलता रातों-रात नहीं मिली। इसके पीछे साल 2023 से चल रही लंबी रिसर्च और मेहनत है। ICAR-NDRI करनाल, पंतनगर विश्वविद्यालय और उत्तराखंड बायोटेक्नोलॉजी काउंसिल के वैज्ञानिकों ने मिलकर इस प्रोजेक्ट को सफल बनाया है। डॉ. एमएस चौहान की पहल पर शुरू हुए इस मिशन में डॉ. नरेश सेलोकर, डॉ. शिव प्रसाद और डॉ. संजय शर्मा जैसे दिग्गज वैज्ञानिकों की टीम ने दिन-रात काम किया है।

बद्री गाय इतनी खास क्यों है?

पहाड़ों की यह देसी गाय कई मायनों में बेहद अनूठी है:

• पहचान: साल 2016 में इसे देश की 40वीं और उत्तराखंड की पहली प्रमाणित गोवंश नस्ल का दर्जा मिला था।

• मजबूत बनावट: इनका वजन 200 से 250 किलो होता है, और इनके सख्त खुर व सीधे पैर ढलान वाले पहाड़ी रास्तों के लिए एकदम मुफीद होते हैं।

• पोषक दूध: ICAR की एक रिसर्च के मुताबिक, इसके दूध में करीब 88 प्रतिशत A2 प्रोटीन वाला जीन पाया जाता है, जो सेहत के लिए बहुत अच्छा माना जाता है।

• कम खर्च में गुजारा: यह कम चारे और कड़कड़ाती ठंड या कठिन मौसम में भी आसानी से जिंदा रह सकती है।

OPU-IVF तकनीक से क्या बदलेगा?

सामान्य रूप से एक गाय साल में एक ही बछड़ा देती है, लेकिन OPU-IVF तकनीक के जरिए एक बेहतरीन मादा गाय से कई भ्रूण तैयार किए जा सकते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस तकनीक से भविष्य में एक गाय से 50 से 80 से ज्यादा बछड़े संभव हो सकेंगे। इससे न सिर्फ बद्री जैसी दुर्लभ नस्लों की आबादी तेजी से बढ़ाई जा सकेगी, बल्कि पहाड़ के छोटे और सीमांत किसानों की आजीविका को भी नया सहारा मिलेगा।

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