निशानेबाज न्यूज़ डेस्क : पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार के पतन के बाद गुरुवार को बांग्लादेश में पहली बार संसदीय चुनाव आयोजित हो रहा है। अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस की अगुवाई में हो रहे इस मतदान पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर बनी हुई है। खास तौर पर भारत और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देशों के लिए यह चुनाव कूटनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
क्षेत्रीय रिश्तों पर पड़ सकता है असर
यूनुस सरकार के कार्यकाल में भारत-बांग्लादेश संबंधों में कुछ तनाव देखने को मिला है, जबकि पाकिस्तान के साथ नजदीकियां बढ़ने की चर्चा रही है। ऐसे में चुनाव परिणाम दक्षिण एशिया की रणनीतिक राजनीति और क्षेत्रीय संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं।
350 सदस्यीय संसद और अनोखी चुनाव प्रणाली
बांग्लादेश की जातीय संसद में कुल 350 सदस्य होते हैं, जिनका कार्यकाल पांच वर्ष का होता है। इनमें से 300 सीटों पर जनता सीधे मतदान करती है, जबकि 50 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित रहती हैं। इन आरक्षित सीटों पर प्रतिनिधियों का चयन चुनाव परिणामों में पार्टियों की हिस्सेदारी के आधार पर किया जाता है।
आवामी लीग पर प्रतिबंध, जमात की वापसी
इस चुनाव की सबसे बड़ी खासियत यह है कि पूर्व सत्तारूढ़ आवामी लीग चुनावी मुकाबले से बाहर है। वहीं पहले प्रतिबंधित जमात-ए-इस्लामी को फिर से राजनीतिक गतिविधियों की अनुमति दी गई है, जिससे राजनीतिक समीकरण बदलते नजर आ रहे हैं।
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भारत-पाकिस्तान से अलग शासन व्यवस्था
भारत और पाकिस्तान में द्विसदनीय संसदीय प्रणाली तथा राज्य सरकारों की संरचना मौजूद है, जबकि बांग्लादेश में एकात्मक व्यवस्था लागू है। यहां न तो राज्य हैं और न ही मुख्यमंत्री का पद। पूरा प्रशासनिक ढांचा केंद्र के अधीन संचालित होता है, जिसे आठ डिवीजनों में विभाजित किया गया है।
नतीजों पर टिकी वैश्विक नजर
विशेषज्ञों का मानना है कि इस चुनाव का परिणाम केवल बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति ही नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया की कूटनीतिक दिशा भी तय कर सकता है। इसलिए ढाका में हो रही चुनावी प्रक्रिया को वैश्विक स्तर पर गंभीरता से देखा जा रहा है।









