Bangladesh Crisis 2025 : ढाका: पड़ोसी देश बांग्लादेश इस समय एक ऐसे ज्वालामुखी पर बैठा है, जिसके फटने का डर हर पल बना हुआ है। छात्र नेता उस्मान हादी की मौत के बाद राजधानी ढाका में जो मंजर उभरा है, वह केवल दुख का नहीं बल्कि गहरे खौफ और अनिश्चितता का है। 18 दिसंबर की रात जैसे ही सिंगापुर में हादी के निधन की खबर आई, ढाका की सड़कों पर उग्र भीड़ का तांडव शुरू हो गया। हिंसा की इस आग ने न केवल अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया, बल्कि देश के सबसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों को भी राख के ढेर में तब्दील कर दिया। शाहबाग से लेकर जगन्नाथ हॉल तक, आज सन्नाटा तो है, पर यह शांति किसी बड़े खतरे की चेतावनी जैसी लगती है।
Bangladesh Crisis 2025 : हिंसक भीड़ के निशाने पर इस बार लोकतंत्र का चौथा स्तंभ रहा। ढाका के करवान बाजार स्थित ‘प्रथोम अलो’ के मुख्यालय को उपद्रवियों ने पूरी तरह जला दिया। दफ्तर के बाहर आज भी जली हुई मैगजीनें, राख और टूटे शीशे बिखरे पड़े हैं, जो उस रात की बर्बरता की गवाही दे रहे हैं। इसी तरह ‘डेली स्टार’ के दफ्तर को भी तहस-नहस कर दिया गया। सांस्कृतिक केंद्र ‘छायानट’ पर हुए हमले ने यह साफ कर दिया है कि अराजक तत्वों के निशाने पर अब बांग्लादेश की स्वतंत्र सोच और सांस्कृतिक पहचान भी है।
Bangladesh Crisis 2025 : सबसे दुखद स्थिति हिंदू और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों की है। ढाका विश्वविद्यालय का जगन्नाथ हॉल, जहाँ अल्पसंख्यक छात्र रहते हैं, वहां दहशत का साया सबसे गहरा है। जुलाई की हिंसा और हाल ही में हुई दीपू दास जैसी लिंचिंग की घटनाओं ने छात्रों को इस कदर डरा दिया है कि उन्होंने विंटर वेकेशन के बावजूद हॉस्टल के गेट पर तीन-तीन ताले जड़ दिए हैं। छात्र भीतर कैद होकर पढ़ने या खेलने को मजबूर हैं, लेकिन वे कैमरे के सामने बोलने या बाहर निकलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं।
Bangladesh Crisis 2025 : दूसरी ओर, ढाका का शाहबाग इलाका एक बार फिर कट्टरपंथी और उग्र प्रदर्शनों का गढ़ बन गया है। यहाँ की दीवारों पर ‘इस्लामिक रिवॉल्यूशन’ के नारे और ग्रैफिटी बांग्लादेश के बदलते और तनावपूर्ण सामाजिक-राजनीतिक ढांचे की ओर इशारा कर रहे हैं। दोपहर होते-होते यहाँ भारी भीड़ जमा हो जाती है और नारेबाजी का दौर शुरू हो जाता है, जिससे सुरक्षा बलों के लिए स्थिति को संभालना चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।
Bangladesh Crisis 2025 : विशेषज्ञों का कहना है कि मीडिया संस्थानों और सांस्कृतिक केंद्रों पर ये हमले बांग्लादेश के लोकतांत्रिक भविष्य के लिए एक खतरे की घंटी हैं। पुलिस और रैपिड एक्शन बटालियन (RAB) की भारी तैनाती के बावजूद शहर के भीतर डर की एक ऐसी लहर है जिसे फिलहाल थामना मुश्किल लग रहा है। फिलहाल, ढाका की ये खामोश सड़कें किसी अनहोनी का इंतजार करती नजर आ रही हैं।











