Indigo Crisis : नई दिल्ली/मुंबई। भारत की सबसे बड़ी एयरलाइन इंडिगो में नवंबर और दिसंबर 2025 की शुरुआत में आई व्यापक अव्यवस्था ने देश के तीसरे सबसे बड़े एविएशन सेक्टर की एक गंभीर खामी को उजागर कर दिया है। 3 से 9 नवंबर के बीच इंडिगो की देशभर में 5,000 से अधिक उड़ानें रद्द हुईं, जिसके बाद दिसंबर के पहले हफ्ते में यह संकट और गहरा गया जब एक ही दिन में 1,000 से ज्यादा उड़ानें रद्द कर दी गईं, जिससे 10 लाख से अधिक बुकिंग्स प्रभावित हुईं। इस गड़बड़ी ने न केवल यात्रियों को देशभर में घंटों परेशान किया, बल्कि सरकार को हस्तक्षेप करने और एयरलाइन की कार्यप्रणाली की जांच का आदेश देने के लिए मजबूर कर दिया।
Indigo Crisis : संकट का मुख्य कारण मार्केट में कम प्रतिस्पर्धा का होना है। 2007 में शुरू हुई इंडिगो की जबरदस्त कामयाबी ने उसे भारतीय डोमेस्टिक एविएशन मार्केट का 64% से ज्यादा हिस्सा दे दिया है। इतनी बड़ी हिस्सेदारी वाली कंपनी में गड़बड़ी होते ही देशभर के हवाई अड्डे ठप हो गए। हालात इतने बिगड़ गए कि नागरिक उड्डयन मंत्री के. राम मोहन नायडू को संसद में यह कहना पड़ा कि कोई भी एयरलाइन यात्रियों को इतना परेशान नहीं कर सकती। उन्होंने ‘सख्त कार्रवाई’ का आश्वासन दिया और कहा कि भारत को हवाई यात्रा की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए 5 बड़ी एयरलाइंस की जरूरत है, जो बाजार में मोनोपॉली को समस्या मानने का संकेत है।
Indigo Crisis : इंडिगो का यह संकट भारत की सबसे तेज बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी समस्या को उजागर करता है: बाजार पर कुछ बड़ी कंपनियों का बढ़ता नियंत्रण। एविएशन के अलावा, भारत के सबसे फायदेमंद एयरपोर्ट दो कंपनियां चलाती हैं, देश के 40% ईंधन की रिफाइनिंग भी दो कंपनियां करती हैं। इसके अतिरिक्त, दूरसंचार, ई-कॉमर्स, बंदरगाह और स्टील जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में भी कुछ ही बड़ी कंपनियां हावी हैं। राजनीतिक अर्थशास्त्री रोहित ज्योतिष के अनुसार, इस तरह के बाजार का खतरा यह है कि आपके पास केवल दो फेलियर पॉइंट (Two Failure Points) होते हैं।
Indigo Crisis : अर्थशास्त्री इस बढ़ती केंद्रीकरण को कॉर्पोरेट आय और संपत्तियों में हिस्सेदारी के तेजी से बढ़ने के रूप में देख रहे हैं। बड़ी कंपनियों के बड़ा होने का एक मुख्य कारण आसान कर्ज है। शोधकर्ताओं का मानना है कि 2015 के बाद से, बैंक सिर्फ सबसे ताकतवर कंपनियों को ही कर्ज दे रहे हैं, जिससे नई कंपनियों के लिए बाजार में प्रवेश करना सबसे बड़ी रुकावट बन गया है। न्यूयार्क यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर विरल आचार्य के अनुसार, बड़ी कंपनियों की कर्ज लेने की ताकत अब निर्णायक बन गई है।
Indigo Crisis : इन बढ़ती मोनोपॉली पर लगाम लगाने के लिए भारत के कॉम्पटीशन कमीशन (CCI) के पास सीमित पावर है। सीसीआई सिर्फ संभावित विलय की जांच कर सकता है, लेकिन हवाई जैसे उद्योगों में कंपनियों के आकार में बढ़ोतरी रोकने या मोनोपॉली कम करने की शक्ति उसके पास नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में कभी कॉम्पटीटिव मार्केट्स का मॉडल नहीं रहा, और इस समस्या से निपटने के लिए नियामक की बजाय चुनी हुई सरकारों को ज्यादा प्रतिस्पर्धी हालात बनाने पर जोर देना होगा। इस बीच, इंडिगो की मोनोपॉली को लेकर CCI ने खुद भी जांच शुरू कर दी है, जिससे आने वाले समय में बाजार में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।











