सिंगरौली। जिले में हर हफ्ते आयोजित होने वाली सरकारी जनसुनवाई अब आम जनता के लिए केवल एक दिखावा बनकर रह गई है। अपनी गंभीर समस्याओं के समाधान की उम्मीद लेकर दूर-दराज के गांवों से गरीब लोग चिलचिलाती धूप में जिला मुख्यालय पहुंच रहे हैं। इसके बावजूद उन्हें मौके पर तुरंत समाधान मिलने के बजाय सिर्फ कोरा आश्वासन ही दिया जा रहा है। लगातार आवेदन देने के बाद भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं होने से अब स्थानीय लोगों में प्रशासन के प्रति नाराजगी लगातार बढ़ती जा रही है।
पचास बार गुहार, फिर भी नतीजा शून्य
मुख्यालय से करीब 70 किलोमीटर दूर से पहुंचे एक बुजुर्ग फरियादी ने प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने बताया कि अपनी न्यायसंगत समस्या को लेकर वे अब तक लगभग 50 बार लिखित आवेदन दे चुके हैं। हालांकि आज तक उनकी समस्या का कोई भी समाधान अधिकारियों द्वारा नहीं किया गया। पीड़ित बुजुर्ग ने दुखी मन से बताया कि उन्होंने स्थानीय भाजपा सांसद से भी न्याय की गुहार लगाई थी, लेकिन वहां भी उन्हें केवल औपचारिकता ही देखने को मिली। परिणामस्वरूप, अब जिला प्रशासन से उनकी उम्मीद पूरी तरह टूट चुकी है।
फाइलों में धूल फांक रहे हैं आवेदन
इसी तरह एक अन्य फरियादी संजीत सिंह राजपूत ने नगर निगम की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा किया है। उन्होंने बताया कि नगर निगम ने बिना किसी ठोस वजह के उनका जरूरी बिल रोक दिया है। उन्होंने मामले की निष्पक्ष जांच के लिए कई बार आवेदन दिए, लेकिन अब तक कोई सुनवाई नहीं हुई। कलेक्टर कार्यालय के चक्कर काटने के बाद भी उनकी समस्या जस की तस बनी हुई है। इसके अलावा, करीब 50 वर्षीय बुजुर्ग समय लाल ने भी आरोप लगाया कि जनसुनवाई के आवेदन केवल फाइलों में धूल फांक रहे हैं और अधिकारी जनता को बेवकूफ बना रहे हैं।
मीडिया से कलेक्टरेट की दूरी
इन तमाम गंभीर मामलों को लेकर जब स्थानीय पत्रकारों ने जिला कलेक्टर का पक्ष जानने की कोशिश की, तो उन्हें भी निराशा हाथ लगी। मीडियाकर्मी लगभग तीन घंटे तक तल्ख धूप में कलेक्टर कार्यालय के बाहर इंतजार करते रहे, लेकिन कलेक्टर ने पत्रकारों से मुलाकात करना मुनासिब नहीं समझा। इस घटनाक्रम के बाद कलेक्टरेट परिसर में यह चर्चा तेज हो गई कि जिला प्रशासन जनता की बुनियादी समस्याओं के प्रति जरा भी गंभीर नहीं है।
जवाबदेही पर उठे बड़े सवाल
अंततः, सिंगरौली के आम लोगों के बीच अब यह धारणा पक्की बनती जा रही है कि जनसुनवाई केवल एक कागजी खानापूर्ति है। जमीनी स्तर पर पीड़ितों को राहत नहीं मिल पा रही है, जिससे ग्रामीण अंचलों से आने वाले फरियादियों का समय और पैसा दोनों बर्बाद हो रहे हैं। अब देखना यह होगा कि इस प्रशासनिक सुस्ती पर राज्य सरकार क्या संज्ञान लेती है, ताकि व्यवस्था में सुधार हो सके और पीड़ित जनता को समय पर उचित न्याय मिल पाए।









