mahila aatmadaah : रीवा (हुजूर): प्रशासनिक लापरवाही और सिस्टम की सुस्ती ने एक बार फिर एक बुजुर्ग महिला की जान ले ली। अपनी ही जमीन को अतिक्रमण मुक्त कराने के लिए एक महिला पिछले 14 वर्षों से सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रही थी। कलेक्टर से लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) तक गुहार लगाने के बावजूद जब कोई सुनवाई नहीं हुई, तो सिस्टम से निराश होकर महिला ने खुद को आग के हवाले कर दिया। अधजली हालत में परिजनों ने उन्हें संजय गांधी अस्पताल में भर्ती कराया, जहां इलाज के दौरान उन्होंने दम तोड़ दिया।
घटना हुजूर तहसील के जॉनी गांव की है। मृतका के बेटे प्रद्युम्न त्रिपाठी ने बताया कि उनकी पुश्तैनी जमीन पर कुछ दबंगों ने कब्जा कर रखा था। इस मामले में परिवार को वर्ष 2011 में ही न्यायालय से राहत मिल गई थी और अतिक्रमणकारियों के खिलाफ बेदखली का आदेश जारी कर दिया गया था। लेकिन, यह आदेश केवल फाइलों में ही दबकर रह गया। 2011 से लेकर 2025 आ गया, लेकिन राजस्व अमला उस जमीन को मुक्त कराने में नाकाम साबित हुआ।
mahila aatmadaah : न्यायालय का आदेश हाथ में होने के बावजूद, राजस्व विभाग के अधिकारियों ने कार्रवाई करने में कोई रुचि नहीं दिखाई। पीड़ित परिवार ने स्थानीय तहसीलदार और कलेक्टर से लेकर पीएमओ तक शिकायतें दर्ज कराईं, लेकिन हर जगह से उन्हें सिर्फ कोरे आश्वासन ही मिले। अंततः, न्याय में हो रही लगातार देरी और सिस्टम की संवेदनहीनता से तंग आकर उर्मिला त्रिपाठी ने अग्नि स्नान जैसा आत्मघाती कदम उठा लिया, जिससे उनकी दर्दनाक मौत हो गई।
वहीं, इस हृदयविदारक घटना के बाद प्रशासन का रवैया अभी भी बचावकारी नजर आ रहा है। मामले पर सफाई देते हुए हुजूर तहसीलदार शिव शंकर शुक्ला ने आरोपों को खारिज किया है। उनका कहना है कि पीड़ित परिवार द्वारा जनसुनवाई में केवल एक आवेदन दिया गया था, जिसकी जांच में मौके पर कोई अतिक्रमण नहीं पाया गया।
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तहसीलदार ने यह भी दावा किया कि परिवार ने प्रशासन के सामने किसी भी न्यायालय का बेदखली आदेश प्रस्तुत नहीं किया है। उन्होंने कहा कि बिना तथ्यों के राजस्व अमले पर सवाल उठाना अनुचित है। हालांकि, यह बात गले नहीं उतर रही है कि जिस जमीन के विवाद के चलते एक महिला ने अपनी जान दे दी, वहां प्रशासन को सब कुछ सामान्य नजर आ रहा है।
mahila aatmadaah : यह घटना एक बड़ा सवाल खड़ा करती है कि आखिर क्यों एक न्यायालय का आदेश 14 साल तक लागू नहीं हो सका? एक तरफ बेटा कोर्ट के आदेश की बात कर रहा है, तो दूसरी तरफ तहसीलदार इसे नकार रहे हैं। इस विरोधाभास के बीच एक महिला की जान चली गई, जो स्पष्ट रूप से सिस्टम की विफलता और अधिकारियों की जवाबदेही पर प्रश्नचिन्ह लगाता है।











