काठमांडू/नई दिल्ली: नेपाल एक बार फिर गहरे राजनीतिक उथल-पुथल में फंस गया है। सितंबर में भड़के उग्र “Gen-Z आंदोलन” ने जिस तरह तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया था, उसी आंदोलन की नई लहर से देश एक बार फिर हिंसा और अराजकता का सामना कर रहा है। हालात इतने बिगड़ गए कि काठमांडू समेत कई जिलों में कर्फ्यू लागू करना पड़ा है।
युवा बनाम सत्ता — फिर छिड़ा टकराव
नेपाल में “Gen-Z विद्रोह” एक ऐसा आंदोलन रहा है, जिसमें 18 से 28 वर्ष की उम्र के युवा बेरोजगारी, आर्थिक मंदी, भ्रष्टाचार और कथित सत्ता दुरुपयोग के खिलाफ सड़कों पर उतर आए थे।सितंबर में यही आंदोलन इतना आक्रामक हो गया था कि प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों में लगातार झड़पें हुईं, जिससे राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी और अंततः प्रधानमंत्री ओली को इस्तीफा देना पड़ा।नई अस्थायी सत्ता संभालने के लिए पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की को नेपाल का अंतरिम प्रधानमंत्री बनाया गया था — यह फैसला भी विवादों और अप्रत्याशित राजनीतिक समीकरणों के बीच लिया गया था।
अब क्यों भड़का नया आंदोलन?
रिपोर्टों के अनुसार, हाल के दिनों में
- महंगी होती जीवन-यापन लागत,
- महंगाई,
- बेरोजगारी,
- और राजनीतिक पक्षधरता की बढ़ती लड़ाई
फिर से सड़क पर आ गई है। पूर्व सत्ता पक्ष यानी ओली समर्थक और नए युवा प्रदर्शनकारियों के बीच कई जिलों में सीधी हिंसक भिड़ंत की खबरें सामने आई हैं।
स्थिति को नियंत्रित करने के लिए नेपाल प्रशासन ने:
- कई जिलों में धारा 144
- पुलिस और अर्धसैनिक बलों की तैनाती
- इंटरनेट बंद करने की चेतावनी
- और कई जगह कर्फ्यू
- जैसे सख्त कदम उठाए हैं।
- अंतरिम सरकार पर बढ़ रहा दबाव
अंतरिम प्रधानमंत्री सुशीला कार्की की सरकार पर बढ़ता दबाव साफ दिख रहा है। देशभर में सवाल उठ रहे हैं कि:
- क्या सरकार युवा वर्ग की नाराज़गी को समझने में नाकाम रही?
- क्या ये केवल आर्थिक असंतोष है या राजनीतिक ध्रुवीकरण का हिस्सा?
- और क्या नेपाल फिर से एक बड़ी राजनीतिक उथल-पुथल की ओर बढ़ रहा है?
इस मामले पर विशेषज्ञों का कहना है कि यह आंदोलन केवल सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि युवा पीढ़ी की नई राजनीतिक चेतना का संकेत है — और इसे सिर्फ पुलिस बल से नहीं दबाया जा सकता।
राजनीतिक भविष्य अनिश्चित
नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता कोई नई बात नहीं है, लेकिन “Gen-Z आंदोलन” ने पहली बार संकेत दिया है कि नई पीढ़ी सत्ता को चुनौती देने के लिए संगठित, रणनीतिक और दृढ़ है।स्थानीय मीडिया कह रहा है कि अगर हालात नहीं संभले, तो नेपाल एक और चुनावी या संवैधानिक संकट की ओर बढ़ सकता है।









