नई दिल्ली| एअर इंडिया विमान हादसे पर सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि शुरुआती जांच रिपोर्ट के आधार पर पायलटों को दोषी ठहराना गैर-जिम्मेदाराना है। अदालत ने स्पष्ट किया कि अंतिम रिपोर्ट आने से पहले किसी भी पायलट पर आरोप लगाना उनके परिवारों के लिए बेहद पीड़ादायक होगा।
कोर्ट ने क्या कहा?
बेंच ने कहा, “अगर कल कोई गैर-जिम्मेदारी से कहे कि पायलट ए या बी की गलती थी तो परिवार पीड़ित होगा… और यदि बाद में अंतिम रिपोर्ट में दोष नहीं पाया गया तो क्या होगा? इसलिए जांच पूरी होने तक गोपनीयता बनाए रखना जरूरी है।”
वॉल स्ट्रीट जर्नल रिपोर्ट पर सवाल
यह टिप्पणी उस समय आई जब सेफ्टी मैटर्स फाउंडेशन की ओर से अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने जनहित याचिका दायर कर कोर्ट-निगरानी में स्वतंत्र जांच की मांग की। भूषण ने आरोप लगाया कि अमेरिकी अखबार वॉल स्ट्रीट जर्नल ने शुरुआती रिपोर्ट पर स्टोरी छाप दी, जबकि वह केंद्र को सौंपी भी नहीं गई थी। इसके बाद सरकार ने रिपोर्ट सार्वजनिक की और कहा जाने लगा कि हादसा पायलट की गलती से हुआ।
कंपनियों और अफवाहों पर कोर्ट का रुख
कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि ऐसी त्रासदियों का फायदा कभी-कभी प्रतिद्वंद्वी एयरलाइंस उठा लेती हैं। विमान निर्माता कंपनियां भी अक्सर खुद को बचाने के लिए स्टाफ या पायलट पर दोष मढ़ देती हैं। अदालत ने चेताया कि किसी को भी स्थिति को तोड़-मरोड़ कर पेश करने की इजाजत नहीं होगी।
DGCA और मंत्रालय को नोटिस
सुप्रीम कोर्ट ने DGCA और नागरिक उड्डयन मंत्रालय को नोटिस जारी करते हुए जांच को पारदर्शी, निष्पक्ष और त्वरित रूप से पूरा करने का निर्देश दिया है।
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याचिका में आरोप
जनहित याचिका में कहा गया है कि AAIB की 12 जुलाई को जारी शुरुआती रिपोर्ट में हादसे का कारण फ्यूल कटऑफ स्विच को गलती से ऑफ करना बताया गया है, जो सीधे-सीधे पायलट की चूक का संकेत देता है।
याचिका के अनुसार, रिपोर्ट में महत्वपूर्ण डेटा जैसे – डिजिटल फ्लाइट डेटा रिकॉर्डर (DFDR), कॉकपिट वॉयस रिकॉर्डर (CVR) का पूरा ट्रांसक्रिप्ट और इलेक्ट्रॉनिक एअरक्राफ्ट फॉल्ट रिकॉर्डिंग (EAFR) शामिल नहीं किया गया। बिना इन जानकारियों के जांच पारदर्शी नहीं हो सकती।











