नई दिल्ली। भारत और नेपाल के बीच साझा 1,751 किलोमीटर लंबी खुली सीमा दोनों देशों के रिश्तों की विशेष पहचान है। यहां लोगों को वीज़ा-पासपोर्ट की आवश्यकता नहीं होती। इसकी जड़ें 31 जुलाई 1950 को भारत और नेपाल के बीच हुई शांति और मैत्री संधि में हैं।
इस संधि के तहत दोनों देशों के नागरिकों को एक-दूसरे के देश में व्यापार, संपत्ति खरीदने, निवास और रोज़गार करने का अधिकार मिला। यही कारण है कि हजारों नेपाली भारत में काम करते हैं और भारतीय व्यापारी नेपाल में कारोबार करते हैं।
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क्या कहती है संधि?
संधि के अनुच्छेद 6 और 7 में दोनों देशों के नागरिकों को समान अधिकार दिए गए हैं। अनुच्छेद 2 के अनुसार, भारत और नेपाल को किसी तीसरे देश के साथ गंभीर मतभेद या समझौते की स्थिति में एक-दूसरे को सूचित करना होता है। इसी को लेकर नेपाल अक्सर आपत्ति जताता है कि इससे उसकी स्वतंत्र विदेश नीति सीमित होती है।
नेपाल की आपत्तियाँ
नेपाल कई बार इस संधि को बदलने की मांग उठा चुका है। उसका आरोप है कि 1950 का समझौता उस दौर में राणा शासक से कराया गया था, जो जनता के बीच लोकप्रिय नहीं थे। नेपाल मानता है कि यह संधि भारत के पक्ष में अधिक झुकी हुई है।
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1988 में जब नेपाल ने चीन से हथियार आयात किए, तब भारत ने इसे संधि का उल्लंघन मानते हुए नेपाल पर पारगमन प्रतिबंध लगा दिया। इसका असर नेपाल की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा पर गहराई से पड़ा।
आज का संदर्भ
भारत के लिए नेपाल एक बफर स्टेट की तरह है, जबकि नेपाल व्यापार और रोज़गार के लिए काफी हद तक भारत पर निर्भर है। समय-समय पर संधि को संशोधित करने की बहस उठती रही है, लेकिन अभी तक यह व्यवस्था दोनों देशों के रिश्तों की नींव बनी हुई है।













