Gwalior Special Story : ग्वालियर। समय के साथ बच्चों के खेल और शौक बदल गए हैं। कभी गली-मोहल्लों में गूंजने वाली आवाज “आया रे खेल-खिलौने वाला” अब सुनाई नहीं देती। मोबाइल और गैजेट्स की लत ने बच्चों को खिलौनों से दूर कर दिया है। मगर ग्वालियर के अमर सिंह माहौर आज भी इस विरासत को संजोए हुए हैं।
Gwalior Special Story : अमर सिंह पिछले कई दशकों से हाथ से बने पारंपरिक खिलौनों को घर-घर जाकर बेचते आ रहे हैं। उनकी झोली में 25 तरह के खिलौने होते हैं, जिनमें डमरु, चकरी, चिड़िया, पहलवान और जमीन पर चलने वाला सांप सबसे ज्यादा लोकप्रिय हैं। ये खिलौने लकड़ी और कागज से रंग कर बनाए जाते हैं और इनकी कीमत 1 रुपए से 40 रुपए तक होती है।
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दिल्ली, मुंबई, भोपाल और कोलकाता जैसे बड़े शहरों में भी वे अपने हुनर का प्रदर्शन कर चुके हैं। हाल ही में ग्वालियर में हुए रीजनल टूरिज्म कान्क्लेव में अमर सिंह के खिलौनों की प्रदर्शनी ने सबका दिल जीत लिया। यहां जमकर बिक्री भी हुई और सरकार ने उनकी कला को प्रोत्साहित करने का आश्वासन दिया।
अमर सिंह बताते हैं कि यह कला उन्हें अपने दादा और पिता से विरासत में मिली थी और अब वे अपनी दो बेटियों और 8 साल के पोते को भी यही हुनर सिखा रहे हैं। उनका कहना है—“मोबाइल भले ही बच्चों की पहली पसंद बन गया हो, लेकिन हम खिलौनों की इस परंपरा को खत्म नहीं होने देंगे। यही हमारे परिवार की रोज़ी-रोटी है और हमारी पहचान भी।”









