Supreme Court Courtroom Incident: सुप्रीम कोर्ट हंगामा मामला उस समय चर्चा में आ गया जब एक याचिकाकर्ता ने सुनवाई के दौरान कोर्टरूम में अभद्र व्यवहार किया। उसने कथित तौर पर बेंच के सामने कागज फेंके और अपशब्द कहे। इसके बाद सुरक्षा कर्मियों ने उसे कोर्टरूम से बाहर ले जाकर हिरासत में लिया। हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम के बावजूद भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने उसके खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं करने का फैसला लिया।
सुप्रीम कोर्ट हंगामा मामला जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच के समक्ष सुनवाई के दौरान हुआ। उस समय CJI सूर्यकांत कोर्टरूम में मौजूद नहीं थे। याचिकाकर्ता बिना किसी वकील के स्वयं अपना पक्ष रख रहा था। सुनवाई के दौरान उसके व्यवहार से कुछ समय के लिए अदालत का माहौल प्रभावित हो गया।
सुप्रीम कोर्ट हंगामा मामला: CJI ने क्यों नहीं कराई FIR?
सुप्रीम कोर्ट हंगामा मामला में सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्रार के पास याचिकाकर्ता के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने का विकल्प था। लेकिन जानकारी के अनुसार, जब पूरे घटनाक्रम की सूचना CJI सूर्यकांत को दी गई तो उन्होंने आगे कोई कार्रवाई नहीं करने का निर्देश दिया। अदालत का मानना है कि कई बार इस तरह की घटनाएं केवल सस्ती लोकप्रियता पाने के उद्देश्य से की जाती हैं और कानूनी कार्रवाई से ऐसे लोगों को अनावश्यक प्रचार मिल सकता है।
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सुप्रीम कोर्ट हंगामा मामला: सुनवाई के दौरान क्या हुआ?
सुप्रीम कोर्ट हंगामा मामला में याचिकाकर्ता ने सुनवाई शुरू होते ही कथित तौर पर कहा कि वह लखनऊ के एक ACP के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दे रहा है। इस पर जस्टिस के.वी. विश्वनाथन ने पूछा, “क्या आप मुझे आदेश दे रहे हैं?” इसके बाद याचिकाकर्ता ने कहा कि उसकी बात रिकॉर्ड में है और फिर उसने केस से जुड़े कागज हवा में उछाल दिए। इसके साथ ही उसने कथित रूप से अपशब्द भी कहे।
सुप्रीम कोर्ट हंगामा मामला: सुरक्षा कर्मियों ने तुरंत संभाला मोर्चा
सुप्रीम कोर्ट हंगामा मामला के दौरान याचिकाकर्ता के व्यवहार के बाद सुरक्षा कर्मियों ने तत्काल हस्तक्षेप किया। उसे कोर्टरूम से बाहर ले जाया गया ताकि सुनवाई सामान्य रूप से जारी रह सके। घटना के बाद अदालत की कार्यवाही फिर से शुरू कर दी गई।
सुप्रीम कोर्ट हंगामा मामला: अदालत का संदेश क्या है?
सुप्रीम कोर्ट हंगामा मामला में CJI सूर्यकांत के फैसले को अदालत की एक सोच के रूप में देखा जा रहा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, अदालत का मानना है कि हर मामले में कानूनी कार्रवाई करना जरूरी नहीं होता, खासकर तब जब उससे संबंधित व्यक्ति को अनावश्यक प्रचार मिलने की संभावना हो। हालांकि, अदालत की गरिमा बनाए रखना सर्वोच्च प्राथमिकता है और कोर्ट परिसर में अनुशासन का पालन सभी के लिए आवश्यक है।







