CG NEWS : धारा 170(ख) बना ‘जमीन खेल’ का हथियार? जशपुर में आदिवासी भूमि की बंदरबांट का बड़ा खुलासा, कलेक्टर ने बैठाई जांच

Sanjay Sahu
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CG NEWS : गौरी शंकर गुप्ता /जशपुर। आदिवासी जमीन की रक्षा के लिए बनाया गया कानून अब जशपुर में सवालों के घेरे में है। धारा 170(ख), जिसका मकसद आदिवासी भूमि को गैर-आदिवासियों के कब्जे से बचाना है, उसी के जरिए जमीन के बड़े खेल की आशंका सामने आई है। बगीचा अनुविभागीय क्षेत्र से जुड़े कई मामलों में आदिवासी जमीन के गैर-आदिवासियों के नाम हस्तांतरण के आरोप लगे हैं। मामला उजागर होने के बाद कलेक्टर रोहित व्यास ने जांच के आदेश दे दिए हैं।

CG NEWS : नियम सख्त, लेकिन जमीन पर हकीकत ढीली

कानून के जानकारों के मुताबिक धारा 170(ख) के तहत जमीन हस्तांतरण के लिए स्पष्ट और कड़े नियम हैं।
गैर-आदिवासी का कब्जा वर्ष 1972 से पहले का होना चाहिए
जमीन पर रहने के लिए मकान बना होना चाहिए
संबंधित आदिवासी के पास 6 एकड़ से अधिक भूमि होनी चाहिए
आदिवासी को खुद कलेक्टर के पास आवेदन देना होता है
प्रशासनिक जांच के बाद ही अंतर की राशि देकर हस्तांतरण संभव है

लेकिन बगीचा क्षेत्र में सामने आए मामलों में इन नियमों का पालन होता नहीं दिख रहा। बिना पुराने कब्जे और बिना मकान वाली जमीनों के भी हस्तांतरण के आरोप हैं।

CG NEWS : तीन महीने में तीन बार सौदा—कहानी एक खसरे की

कुरूमकेला (बगीचा) के खसरा नंबर 104/2 का मामला इस पूरे खेल की परतें खोलता है। दिसंबर 2025 तक यह जमीन विश्वनाथ राम (जाति नगेसिया) के नाम दर्ज थी। 23 दिसंबर 2025 को उन्होंने लगभग एक एकड़ जमीन 6.48 लाख रुपये में बलराम को बेच दी। सौदे में 4 लाख रुपये चेक से और बाकी नगद दिए गए।

इस रजिस्ट्री में देवराज यादव और भजूलाल यादव गवाह बने।लेकिन असली मोड़ तब आया जब महज तीन महीने बाद, 12 मार्च 2026 को बलराम ने वही जमीन देवराज यादव के नाम कर दी।यानी गवाह से सीधे खरीदार बनने का सफर—और वो भी 90 दिनों के भीतर—पूरे मामले को संदिग्ध बनाता है।
जमीन पर न मकान, न पुराना कब्जा—फिर कैसे हुआ ट्रांसफर?

रजिस्ट्री दस्तावेज बताते हैं कि जमीन पर न कोई मकान है, न पेड़, न कुआं। जबकि कानून साफ कहता है कि 1972 से पहले का कब्जा और मकान होना अनिवार्य है। ऐसे में बड़ा सवाल यही है—जब बुनियादी शर्तें ही पूरी नहीं हैं, तो जमीन का हस्तांतरण किस आधार पर हुआ?

‘सिंडिकेट मॉडल’ से चल रहा खेल?

स्थानीय सूत्रों का दावा है कि यह कोई एकल मामला नहीं, बल्कि एक संगठित नेटवर्क का हिस्सा है।
भू-माफिया अपने गिरोह में आदिवासी और गैर-आदिवासी दोनों को शामिल करते हैं
पहले जमीन आदिवासी के नाम खरीदी जाती है
फिर तकनीकी जुगाड़ से गैर-आदिवासी के नाम रजिस्ट्री कराई जाती है

बाद में प्लॉटिंग कर ऊंचे दामों में बिक्री

इस पूरे खेल में दलाल, पटवारी और कुछ अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं. ऐसे मामलों में भारतीय दंड संहिता की धारा 420 (धोखाधड़ी) के तहत मामला दर्ज हो सकता है।

प्रशासन का जवाब—‘अंतर की राशि दी गई’

कलेक्टर रोहित व्यास ने कहा कि बगीचा एसडीएम से मिली जानकारी के अनुसार संबंधित प्रकरण में धारा 170(ख) की प्रक्रिया के बाद अंतर की राशि आदिवासी को दी गई है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि विक्रेता संतुष्ट नहीं है तो वह कलेक्टर न्यायालय में शिकायत कर सकता है।

 

CG NEWS : कानूनी राय—सिर्फ कागज नहीं, जमीन भी देखनी होगी

कानून के जानकार सत्यप्रकाश तिवारी का कहना है कि इस तरह के मामलों में सिर्फ कागजी प्रक्रिया पूरी करना पर्याप्त नहीं है।यदि नियमों का उल्लंघन हुआ है, तो प्रशासन को स्वतः संज्ञान लेकर जमीन मूल आदिवासी को वापस दिलानी चाहिए।

 

CG NEWS : बड़ा सवाल—रक्षक ही भक्षक तो नहीं?

 

जशपुर में सामने आए ये मामले कई गंभीर सवाल खड़े करते हैं—क्या कानून का इस्तेमाल ही उसके खिलाफ किया जा रहा है? क्या आदिवासी जमीन की सुरक्षा व्यवस्था कागजों तक सीमित रह गई है? और सबसे बड़ा सवाल—क्या इस पूरे खेल के पीछे एक बड़ा नेटवर्क काम कर रहा है? फिलहाल निगाहें जांच पर टिकी हैं। अब देखना होगा कि कलेक्टर द्वारा दिए गए जांच आदेश इस ‘जमीन खेल’ की सच्चाई उजागर कर पाते हैं या नहीं, और क्या दोषियों पर सख्त कार्रवाई होती है या मामला फाइलों में दबकर रह जाएगा।

 

 

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