Vaikunth Chaturdashi 2025 : उज्जैन। कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी (वैकुण्ठ चतुर्दशी) की रात्रि में भगवान विष्णु और भगवान शिव का मिलन, हरि-हर मिलन के रूप में मनाया जाता है। यहां सत्ता सौंपने के लिए भगवान महाकाल खुद सवारी में पालकी के सवार होकर अपनी बिल्वपत्र की माला पहनकर भगवान विष्णु के पास पहुंचते हैं।
Vaikunth Chaturdashi 2025 : मंत्रों उच्चार के साथ करीब एक घंटे तक पूजन पाठ चलने के बाद भगवान शिव की बेलपत्र की माला भगवान विष्णु को और भगवान विष्णु की तुलसी की माला भगवान महाकाल पहनाकर सत्ता का परिवर्तन होता है। भगवान महाकाल के आंगन से निकली सवारी में उज्जैन कलेक्टर रोशन सिंह, महाकाल मंदिर प्रशासक प्रथम कौशिक मौजूद रहे।
हरिहर मिलन के लिए महाकालेश्वर मंदिर से सोमवार रात 11 बजे सवारी गोपाल मंदिर के लिए धूमधाम से निकली। आतिशबाजी के बीच सवारी महाकाल चौराहा, गुदरी बाजार, पटनी बाजार होते हुए गोपाल मंदिर पहुंची। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने आतिशबाजी करते हुए भगवान महाकाल की सवारी का स्वागत किया।
मान्यता है कि दोनों भगवानों के बीच सत्ता का हस्तांतरण होता है। इसके लिए पंडे-पुजारी द्वारा दोनों भगवानों के समक्ष मंत्र उच्चारण करते हुए तुलसी की माला भगवान विष्णु को स्पर्श कर भगवान शिव को धारण कराई जाती है और बिल पत्र की माला भगवान शिव को स्पर्श करने के बाद भगवान विष्णु को पहनाई जाती है।
इस हरी और हर के मिलन के बाद भगवान शिव चार महीने के लिए सृष्टि के भार को भगवान विष्णु को सौंप देते हैं और हिमालय पर्वत पर चले जाते हैं। इस दौरान दोनों ही देवताओं को एक-दूसरे के प्रिय वस्तुओं का भोग लगाया गया। सवारी गोपाल मंदिर पहुंचती है
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तब हरि-हर के समीप विराजते हैं और इसके बाद सत्ता एक-दूसरे को सौंपने के लिए पूजन विधि शुरू होती है। भगवान श्री महाकालेश्वर एवं श्री द्वारकाधीश का पूजन प्रारंभ होता है। दोनों ही भगवान का दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से पंचामृत अभिषेक किया जाता है।













