निशानेबाज न्यूज़ डेस्क : फिल्म ‘घूसखोर पंडत’ के शीर्षक को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट संकेत दिया है कि नाम में बदलाव नहीं होने पर फिल्म की रिलीज पर रोक लग सकती है। याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र का महत्वपूर्ण अधिकार है, लेकिन इसके नाम पर किसी भी सामाजिक वर्ग को अपमानित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
क्रिएटिव स्वतंत्रता की संवैधानिक सीमाएं
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना की पीठ ने टिप्पणी की कि रचनात्मक स्वतंत्रता पूर्णतः निरंकुश अधिकार नहीं है और इसे संविधान के मूल्यों व सामाजिक संवेदनशीलता के दायरे में रहकर ही प्रयोग किया जाना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों में ऐसे शीर्षक अनावश्यक तनाव और विभाजन को बढ़ावा दे सकते हैं।
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निर्माताओं को नोटिस, हलफनामा मांगा
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने फिल्म के निर्माताओं, निर्देशकों और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया। अदालत ने पूछा कि आपत्तिजनक माने जा रहे शीर्षक के बावजूद फिल्म की रिलीज क्यों न रोकी जाए। साथ ही यह भी स्पष्ट करने को कहा गया कि फिल्म की सामग्री में किसी समुदाय विशेष के प्रति अपमानजनक तत्व मौजूद हैं या नहीं। इस संबंध में हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया गया है।
19 फरवरी को अगली सुनवाई
पीठ ने ‘बंधुत्व’ को संविधान की मूल संरचना का अहम हिस्सा बताते हुए कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता इस मूल भावना को कमजोर नहीं कर सकती। अदालत ने चेतावनी दी कि यदि निर्माता शीर्षक बदलने या आवश्यक संशोधन करने के लिए तैयार नहीं होते, तो न्यायालय हस्तक्षेप करने से पीछे नहीं हटेगा। मामले की अगली सुनवाई 19 फरवरी को निर्धारित की गई है।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद फिल्म की रिलीज अनिश्चितता में घिर गई है और पूरे फिल्म उद्योग की नजर अब अगली सुनवाई पर टिकी हुई है।









