PM Narendra Modi Sanskrit Shlok : नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को ‘विकसित भारत 2047’ के विजन को साकार करने के लिए देशवासियों में आत्मविश्वास भरने वाला एक विशेष संस्कृत सुभाषितम साझा किया। प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया कि विकसित राष्ट्र का सपना केवल तकनीक या अर्थव्यवस्था से नहीं, बल्कि नागरिकों के दृढ़ आत्मविश्वास और संकल्प की शक्ति से संभव होगा।
आत्मविश्वास वह शक्ति है, जिसके बल पर सब कुछ संभव है। विकसित भारत के सपने को साकार करने में देशवासियों की यही शक्ति बहुत काम आने वाली है।
श्रीर्मङ्गलात् प्रभवति प्रागल्भ्यात् सम्प्रवर्धते।
दाक्ष्यात् तु कुरुते मूलं संयमात् प्रतितिष्ठति॥ pic.twitter.com/FcQqHbSvI9
— Narendra Modi (@narendramodi) February 3, 2026
क्या है वह श्लोक और उसका अर्थ? प्रधानमंत्री ने निम्नलिखित श्लोक के माध्यम से विकास के चार स्तंभों को रेखांकित किया:
श्रीर्मङ्गलात् प्रभवति प्रागल्भ्यात् सम्प्रवर्धते। दाक्ष्यात् तु कुरुते मूलं संयमात् प्रतितिष्ठति॥
इसका भावार्थ: इस सुभाषितम के अनुसार, लक्ष्मी (संपत्ति/उन्नति) मंगलकारी कार्यों से उत्पन्न होती है, प्रतिभा (धैर्य और चतुरता) से बढ़ती है, दक्षता (कौशल) से जड़ पकड़ती है और संयम (अनुशासन) से स्थिर होती है।
देशवासियों की शक्ति पर भरोसा प्रधानमंत्री ने एक्स (X) पर अपनी पोस्ट में लिखा, “आत्मविश्वास वह शक्ति है, जिसके बल पर सब कुछ संभव है। विकसित भारत के सपने को साकार करने में देशवासियों की यही शक्ति बहुत काम आने वाली है।” प्रधानमंत्री का यह संदेश युवाओं, उद्यमियों और कौशल विकास में लगे नागरिकों के लिए एक बड़े प्रोत्साहन के रूप में देखा जा रहा है।
सांस्कृतिक विरासत और विकास का तालमेल यह पहली बार नहीं है जब प्रधानमंत्री ने प्राचीन भारतीय साहित्य का उपयोग आधुनिक समस्याओं के समाधान या प्रेरणा के लिए किया हो। ‘विकसित भारत’ के निर्माण में जहाँ एक ओर आधुनिक इन्फ्रास्ट्रक्चर पर जोर दिया जा रहा है, वहीं प्रधानमंत्री बार-बार देश की सांस्कृतिक जड़ों और ‘आत्मविश्वास’ को विकास की धुरी बता रहे हैं।











