Religion Desk/ रायपुर। हिंदू धर्म में पितृ पक्ष का अत्यंत पवित्र महत्व है। मान्यता है कि इस अवधि में श्राद्ध और पिंडदान से पितरों की आत्मा संतुष्ट होती है और उनका आशीर्वाद परिवार पर बना रहता है। इस बार पितृ पक्ष में एक विशेष संयोग बन रहा है, जिसमें तृतीया और चतुर्थी का श्राद्ध एक ही दिन सम्पन्न होगा।
पंडित सुभाष पांडे के अनुसार, तृतीया और चतुर्थी के श्राद्ध का एक साथ होना विशेष योग माना जाता है। इस दिन किया गया तर्पण और दान पितरों के कल्याण के लिए अत्यंत फलदायी होता है।
तृतीया और चतुर्थी का संगम
इस वर्ष पितृ पक्ष की शुरुआत 7 सितंबर से हुई और यह 21 सितंबर को सर्वपितृ अमावस्या तक चलेगा। बुधवार, 10 सितंबर को तृतीया और चतुर्थी दोनों तिथियों का श्राद्ध एक साथ किया जाएगा।
- तृतीया श्राद्ध: जिनका निधन किसी भी माह के कृष्ण या शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हुआ हो, उनका श्राद्ध इस दिन किया जाता है। इसे तीज श्राद्ध भी कहा जाता है।
- चतुर्थी श्राद्ध: इस दिन उन दिवंगतों का श्राद्ध और पिंडदान किया जाता है, जिनका देहांत चतुर्थी तिथि को हुआ हो।
श्राद्ध का मुहूर्त (पंडित सुभाष पांडे के अनुसार)
- कुतुप मुहूर्त: सुबह 11:53 से दोपहर 12:43 बजे तक
- रौहिण मुहूर्त: दोपहर 12:43 से 1:33 बजे तक
- अपराह्न काल: दोपहर 1:33 से शाम 4:02 बजे तक
एकसाथ दो तिथियों का श्राद्ध कैसे करें?
- स्नान कर हल्के या सफेद वस्त्र धारण करें।
- पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध करें और दक्षिण दिशा की ओर मुख कर आसन ग्रहण करें।
- प्रत्येक तिथि के लिए अलग संकल्प लें और पितरों का नाम व गोत्र उच्चारित करें।
- तांबे के पात्र में गंगाजल, काले तिल, जौ और दूध मिलाकर तीन-तीन बार जल अर्पित करें।
- तर्पण के दौरान कुश की अंगूठी दाहिने हाथ की अनामिका में पहनकर अंगूठे की ओर से जल अर्पित करें।
- श्राद्ध के बाद ब्राह्मणों को भोजन कराएं और सामर्थ्य अनुसार दान-दक्षिणा दें। दोनों तिथियों के लिए दान अलग-अलग करना आवश्यक है।
पितृ पक्ष का महत्व
पंडित सुभाष पांडे के अनुसार, पितृ पक्ष में श्राद्ध व तर्पण करने से पितरों की आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति होती है और परिवार पर समृद्धि बनी रहती है। यही कारण है कि इस अवधि में आस्था और परंपरा का विशेष संगम देखने को मिलता है।








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