Saturday, August 22, 2026
Home Madhya Pradesh MP Administration Failure: सिंगरौली में कानून के नाम पर भूली इंसानियत: भारी...

MP Administration Failure: सिंगरौली में कानून के नाम पर भूली इंसानियत: भारी बरसात के बीच पुलिस-प्रशासन ने चलवाई जेसीबी, मलबे में तब्दील हुई वर्षों की कमाई

MP Administration Failure: सिंगरौली: मध्य प्रदेश के सिंगरौली जिले के माडा थाना क्षेत्र से एक बेहद विचलित करने वाली और प्रशासनिक संवेदनहीनता को उजागर करने वाली तस्वीर सामने आई है। यहाँ चारों तरफ हो रही मूसलाधार बारिश और जलभराव के बीच एक गरीब किसान के आशियाने को जेसीबी (JCB) मशीन चलाकर मलबे के ढेर में तब्दील कर दिया गया। स्थानीय पुलिस और राजस्व प्रशासन की मौजूदगी में एक निजी कंपनी द्वारा इस पूरी कार्रवाई को अंजाम दिया गया। इस घटना के बाद पीड़ित परिवार के सामने अब सिर छिपाने तक की जगह नहीं बची है और वे इस कड़कड़ाती मानसूनी बारिश में खुले आसमान के नीचे रातें काटने को मजबूर हैं।

मलबे में दबी गृहस्थी, दाने-दाने को मोहताज हुआ परिवार

यह दर्दनाक मामला माडा थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले बधोरा इलाके के करसुआलाल गांव का है। पीड़ित किसान अखिलेश जायसवाल का आरोप है कि पुलिस और प्रशासन के बड़े अधिकारियों के संरक्षण में निजी कंपनी के कर्मचारियों ने अचानक जेसीबी लेकर उनके घर पर धावा बोल दिया। देखते ही देखते उनकी वर्षों की गाढ़ी कमाई से खड़ा किया गया मकान चंद मिनटों के भीतर मिट्टी में मिला दिया गया। पीड़ित का कहना है कि उन्हें संभलने तक का मौका नहीं दिया गया, जिससे घर के भीतर रखा राशन, कपड़े और गृहस्थी का सारा कीमती सामान मलबे के नीचे दबकर नष्ट हो गया। अब पूरा परिवार इस बेमौसम बेघरी के चलते दाने-दाने के लिए तरस रहा है।

बिना मुआवजे और पुनर्वास के जबरन बेदखली का आरोप

घटना को लेकर स्थानीय ग्रामीणों और प्रभावित परिवार में भारी आक्रोश व्याप्त है। सबसे गंभीर आरोप यह लगाया गया है कि जमीन का उचित और वैधानिक मुआवजा दिए बिना ही कंपनी ने प्रशासनिक अमले के सहयोग से यह दमनकारी और जबरन कार्रवाई की है। पीड़ित परिवार का कहना है कि न तो उन्हें प्रशासन की तरफ से कोई पुनर्वास पैकेज मिला है और न ही इस आपदा के समय रहने के लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था (शरण स्थली) दी गई। ग्रामीणों ने कंपनी और स्थानीय प्रशासन पर घोर संवेदनहीनता का आरोप लगाते हुए मांग की है कि पीड़ित किसान को तत्काल उचित मुआवजा दिया जाए और नया मकान बनाकर उन्हें सम्मानपूर्वक बसाया जाए। हालांकि, इस पूरे विवाद पर निजी कंपनी की ओर से अब तक कोई भी आधिकारिक पक्ष या सफाई सामने नहीं आई है।

कोर्ट के आदेश का हवाला, लेकिन मुआवजे पर चुप्पी

इस संवेदनशील और अमानवीय मामले पर जब नायब तहसीलदार प्रतीक्षा सिंह से सवाल किया गया, तो उन्होंने प्रशासनिक कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा कि संबंधित जमीन और व्यक्ति के खिलाफ बेदखली का मामला काफी समय से न्यायालय में विचाराधीन था। न्यायालय द्वारा जारी अंतिम आदेश के अनुपालन में ही यह बेदखली की कार्रवाई की गई है। हालांकि, जब मीडिया ने उनसे प्रभावित परिवार को मिलने वाले मुआवजे और पुनर्वास नीतियों के बारे में तीखा सवाल पूछा, तो उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उन्हें मुआवजे के संबंध में कोई जानकारी नहीं है।

अब यहाँ सबसे बड़ा और गंभीर यक्ष प्रश्न यही खड़ा होता है कि यदि कार्रवाई न्यायालय के आदेश पर ही की जा रही थी, तो क्या एक जिम्मेदार प्रशासन का यह नैतिक और विधिक दायित्व नहीं था कि वह बेघर होने वाले परिवार के पुनर्वास और मुआवजे की व्यवस्था पहले सुनिश्चित करता? क्या इस भीषण बरसात के बीच एक हंसते-खेलते परिवार को खुले आसमान के नीचे फेंक देना महज एक प्रशासनिक मजबूरी थी या फिर व्यवस्था की क्रूर संवेदनहीनता? फिलहाल, इस बेघर हुए किसान परिवार के आंसू इन सभी अनुत्तरित सवालों के जवाब तलाश रहे हैं।

Share The News

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here