रीवा। Nishaanebaz.com-Rewa Nuclear Power Plant: मध्य प्रदेश के रीवा जिले में रोझौही न्यूक्लियर पावर प्लांट के लिए प्रस्तावित साइट को लेकर गंभीर प्रशासनिक और सामाजिक विवाद खड़ा हो गया है। वन अधिकार पट्टे की भूमि पर ही परमाणु संयंत्र के लिए जमीन प्रस्तावित किए जाने और सुरक्षा मानकों के कथित उल्लंघन के खिलाफ स्थानीय आदिवासियों और ग्रामीणों का उग्र विरोध प्रदर्शन लगातार जारी है। ग्रामीणों और आदिवासियों का आरोप है कि शासन के वन विभाग, राजस्व विभाग एवं पंचायत विभाग के आपसी समन्वय से वर्ष 2020-21 में ही उन्हें उसी स्थान पर वन अधिकार पट्टे वितरित किए गए थे, जहां अब टाटा कंपनी द्वारा न्यूक्लियर पावर प्लांट लगाया जाना प्रस्तावित है। ग्रामीणों का मुख्य सवाल यह है कि जब सरकार की कानूनी प्रक्रिया के तहत उन्हें वैध पट्टे दिए जा चुके हैं, तो फिर संबंधित विभागों द्वारा टाटा कंपनी को किस आधार पर अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी किया गया।
प्रस्तावित न्यूक्लियर साइट के चयन को लेकर तकनीकी और सुरक्षा संबंधी मापदंडों पर भी बड़े सवाल खड़े किए जा रहे हैं।
तय मानकों के अनुसार परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के नियमों के मुताबिक, प्रस्तावित साइट के 5 किलोमीटर के दायरे में 20,000 से कम आबादी होनी चाहिए, और 10 किलोमीटर के दायरे में 10,000 से अधिक आबादी वाला कोई बड़ा जनसंख्या केंद्र नहीं होना चाहिए। जबकि जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल विपरीत है और रोझौही न्यूक्लियर प्लांट की प्रस्तावित साइट के 5 किलोमीटर के दायरे में ही लगभग 30,000 की आबादी निवास करती है। इसके अलावा, 10 किलोमीटर के दायरे में लालगांव पंचायत का कस्बाई क्षेत्र है जिसकी अकेले की आबादी करीब 15,000 है। साथ ही, जिस ग्राम पंचायत ‘सरई कला’ में यह पावर प्लांट लगाया जाना है, अकेले वहां की आबादी भी लगभग 5,000 के आसपास है।
जानकारों और आदिवासियों का कहना है कि यह साइट चयन इन सभी सुरक्षा और जनसांख्यिकीय मापदंडों पर खरा नहीं उतरता है और घनी आबादी के बीच इस तरह का प्रोजेक्ट लोगों की सुरक्षा के साथ सीधा खिलवाड़ है। रोझौही और सरई कला के ग्रामीण इस पूरी परियोजना के खिलाफ पूरी तरह लामबंद हो चुके हैं। ग्रामीणों ने मांग की है कि इस न्यूक्लियर परियोजना को तत्काल प्रभाव से इस क्षेत्र से वापस लिया जाए, ताकि उनके वैध वन अधिकार पट्टों को यथावत रखा जा सके और उनकी उपजाऊ भूमि व बस्तियां सुरक्षित रह सकें।