निशानेबाज न्यूज़ डेस्क : माइक्रो स्ट्रेस यानी रोज़मर्रा की छोटी-छोटी चिंताएं, जो देखने में मामूली लगती हैं लेकिन लगातार मन और शरीर पर दबाव बनाती रहती हैं। सुबह देर हो जाना, काम की डेडलाइन, मोबाइल नोटिफिकेशन की भरमार, घर-ऑफिस की जिम्मेदारियां या रिश्तों की छोटी नाराज़गी—ये सभी माइक्रो स्ट्रेस के सामान्य कारण हैं। समस्या तब बढ़ती है जब ये तनाव बार-बार होने लगता है और व्यक्ति को खुद के लिए समय नहीं मिल पाता।
सेहत पर पड़ने वाला छिपा असर
विशेषज्ञों के अनुसार लगातार बना रहने वाला माइक्रो स्ट्रेस शरीर में तनाव हार्मोन का स्तर बढ़ा देता है। इससे ब्लड प्रेशर बढ़ने, दिल पर दबाव पड़ने और इम्यून सिस्टम कमजोर होने का खतरा रहता है। परिणामस्वरूप बार-बार सर्दी-जुकाम, संक्रमण, गैस, एसिडिटी और पेट दर्द जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं।
मानसिक रूप से व्यक्ति थकान, उदासी, ध्यान की कमी और चिड़चिड़ापन महसूस करता है। नींद पूरी न होने से दिनभर सुस्ती रहती है और काम करने की क्षमता घटती जाती है। लंबे समय तक यह स्थिति चिंता और डिप्रेशन जैसी गंभीर मानसिक समस्याओं में बदल सकती है।
किन लोगों को ज्यादा खतरा?
मल्टीटास्किंग करने वाले लोग—जैसे कामकाजी महिलाएं, छात्र और लगातार टारगेट पूरा करने वाले कर्मचारी—माइक्रो स्ट्रेस की चपेट में जल्दी आते हैं। परफेक्शन की चाह, दूसरों की अपेक्षाओं का दबाव, सोशल मीडिया तुलना और डिजिटल गैजेट्स का अत्यधिक उपयोग भी तनाव को बढ़ाते हैं।
माइक्रो स्ट्रेस से बचने के आसान उपाय
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रोज़ 7–8 घंटे की पर्याप्त नींद लें।
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दिनभर में छोटे-छोटे ब्रेक जरूर लें।
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मोबाइल नोटिफिकेशन सीमित रखें और स्क्रीन टाइम कम करें।
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समय प्रबंधन और प्राथमिकताएं तय करने की आदत डालें।
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रोज़ हल्का व्यायाम, योग या ध्यान करें।
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परिवार और दोस्तों से खुलकर बातचीत करें।
छोटी-छोटी चिंताओं को समय रहते संभालना ही मानसिक और शारीरिक सेहत को सुरक्षित रखने की सबसे बड़ी कुंजी है।













