MP News: आजादी के 80 साल बाद भी नागौर पर नहीं हुआ गौर, दलदल पार कर स्कूल पहुंचते हैं गुरुजी; जर्जर छत के नीचे पढ़ रहे नौनिहाल

Anuj Nirala

[nishaanebaz.com] MP News: प्रदीप शर्मा\ भिंड। देश आजादी के 80 साल पूरे होने का जश्न मना रहा है, लेकिन मध्यप्रदेश के भिंड जिले का नागौर गांव आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहा है। जिला मुख्यालय से करीब 25 किलोमीटर दूर बसे इस गांव में बरसात के तीन महीने ग्रामीणों के लिए किसी मुसीबत से कम नहीं होते। गांव को मुख्य मार्ग से जोड़ने वाली करीब 2 किलोमीटर की कच्ची सड़क बारिश होते ही दलदल में बदल जाती है। हालात ऐसे हो जाते हैं कि स्कूल जाने वाले शिक्षक जूते हाथ में लेकर कीचड़ पार करने को मजबूर हैं, जबकि मरीजों और गर्भवती महिलाओं को चारपाई पर उठाकर मुख्य सड़क तक ले जाना पड़ता है।

नागौर गांव की समस्या केवल खराब सड़क तक सीमित नहीं है। यहां का प्राथमिक स्कूल भी बदहाल स्थिति में है। जर्जर छत से बारिश का पानी टपकता है और कई बार स्कूल के कमरों में पानी भर जाता है। ऐसे हालात में बच्चों की पढ़ाई के साथ उनकी सुरक्षा को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।

बारिश होते ही दलदल बन जाता है 2 किलोमीटर का रास्ता

पांडरी मुख्य मार्ग से नागौर गांव की दूरी करीब दो किलोमीटर है। सामान्य दिनों में ग्रामीण किसी तरह इस रास्ते से आवाजाही कर लेते हैं, लेकिन बारिश शुरू होते ही यही रास्ता उनकी सबसे बड़ी परेशानी बन जाता है।कच्ची सड़क पर पानी भरने के बाद मिट्टी दलदल में तब्दील हो जाती है। स्कूल जाने वाले शिक्षकों को कई बार अपने जूते हाथ में लेकर कीचड़ के बीच से गुजरना पड़ता है। ग्रामीणों का कहना है कि यह समस्या इस साल की नहीं है, बल्कि हर बारिश में उन्हें इसी परेशानी का सामना करना पड़ता है।

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जर्जर स्कूल भवन में पढ़ने को मजबूर बच्चे

गांव के प्राथमिक स्कूल की स्थिति भी चिंता बढ़ाने वाली है। बारिश के दौरान जर्जर छत से पानी टपकता है और कमरों में पानी भर जाता है। ऐसे में बच्चों को स्कूल भवन में बैठाना शिक्षकों के लिए भी चुनौती बन जाता है।बताया गया कि कई बार हालात इतने खराब हो जाते हैं कि शिक्षकों को बच्चों की सुरक्षा को देखते हुए ग्रामीणों के घरों में कक्षाएं संचालित करनी पड़ती हैं। जिस स्कूल में बच्चों को बेहतर भविष्य की नींव मिलनी चाहिए, वहां बारिश के दिनों में उन्हें सुरक्षित जगह तलाशनी पड़ती है।

मरीजों को चारपाई पर ले जाने की मजबूरी

करीब 450 की आबादी वाले नागौर गांव में किसी व्यक्ति के बीमार पड़ने या महिला को प्रसव पीड़ा होने पर परेशानी और बढ़ जाती है। खराब रास्ते के कारण एंबुलेंस गांव के अंदर तक नहीं पहुंच पाती। ऐसे में ग्रामीणों को मरीज को चारपाई पर लिटाकर करीब दो किलोमीटर तक कीचड़ भरे रास्ते से मुख्य सड़क तक ले जाना पड़ता है।

ग्रामीणों के लिए यह स्थिति केवल असुविधा नहीं, बल्कि कई बार गंभीर स्वास्थ्य जोखिम भी पैदा कर सकती है। खासकर गर्भवती महिलाओं और गंभीर रूप से बीमार मरीजों के लिए समय पर अस्पताल पहुंचना बेहद जरूरी होता है।

कई बार गुहार, फिर भी सड़क का इंतजार

ग्रामीणों का कहना है कि गांव को पक्की सड़क से जोड़ने की मांग लंबे समय से की जा रही है। इसके बावजूद अब तक समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सका है। बरसात के तीन महीने गांव का संपर्क बेहद मुश्किल हो जाता है।ग्रामीणों की मांग किसी बड़े प्रोजेक्ट या विशेष सुविधा की नहीं है। वे केवल चाहते हैं कि गांव तक ऐसी सड़क बने, जिस पर शिक्षक, बच्चे, मरीज और आम ग्रामीण सुरक्षित तरीके से आ-जा सकें।

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सड़क और स्कूल की मांग बनी सम्मानजनक जिंदगी का सवाल

नागौर गांव की तस्वीर विकास के उन दावों पर सवाल खड़े करती है, जिनमें गांवों तक सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने की बात कही जाती है। यहां शिक्षक दलदल पार करके स्कूल पहुंचते हैं, बच्चे जर्जर भवन में पढ़ते हैं और मरीजों को चारपाई के सहारे मुख्य सड़क तक पहुंचाया जाता है।अब ग्रामीणों की नजर शासन और प्रशासन पर है। सवाल यही है कि आखिर कब नागौर गांव पर गौर होगा और कब यहां पक्की सड़क और सुरक्षित स्कूल भवन का सपना पूरा होगा?

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