‘Kachravo Karb’ : सिंगरौली/भोपाल। मध्य प्रदेश की मोहन यादव कैबिनेट में ग्रामीण विकास एवं पंचायत राज्य मंत्री और चितरंगी विधानसभा की विधायक राधा सिंह एक बार फिर अपने आक्रामक व्यवहार और भाषा के कारण विवादों के केंद्र में हैं। पहले पत्रकारों को धक्का देकर सरकारी कार्यक्रम से बाहर करने और अब फोन पर कथित रूप से धमकी भरा बयान देने का वीडियो वायरल होने से पूरे प्रदेश की राजनीति में हलचल मच गई है। सोशल मीडिया पर मंत्री राधा सिंह तीखे कटाक्षों का निशाना बन गई हैं, वहीं विपक्ष ने इस व्यवहार को सत्ता का घमंड बताते हुए मुख्यमंत्री से तत्काल कार्रवाई की मांग की है।
‘Kachravo Karb’ :
विवाद की शुरुआत तब हुई जब सिंगरौली दौरे पर आईं प्रभारी मंत्री संपतिया उइके के कार्यक्रम में पत्रकारों ने सवाल पूछने की कोशिश की। जवाब देने के बजाय मंत्री राधा सिंह ने पत्रकारों को धक्का देकर कार्यक्रम स्थल से बाहर कर दिया। इस घटनाक्रम के बाद मीडिया जगत में तीखी प्रतिक्रिया सामने आई और कई पत्रकारों ने इसे लोकतांत्रिक मूल्यों पर हमला बताया। यह मामला अभी ठंडा भी नहीं हुआ था कि सोशल मीडिया पर एक नया वीडियो वायरल हो गया, जिसमें मंत्री राधा सिंह फोन पर किसी से कथित रूप से धमकी भरे अंदाज़ में कहती सुनाई देती हैं— “जेकर-जेकर भाव बढ़ा है, ओका कचरवो करब…” (यानी जिसका-जिसका ‘भाव बढ़ा’ है, उसे ‘कचर दिया जाएगा’)।
‘Kachravo Karb’ :
मंत्री के इस कथित बयान ने आम नागरिकों को हैरान कर दिया है और इसे सत्ता के अहंकार की चरम अभिव्यक्ति बताया जा रहा है। सोशल मीडिया पर लोग पूछ रहे हैं कि “यह लोकतंत्र है या ‘लोक-ठुकाई’ तंत्र?” मीम्स और कटाक्षों की बाढ़ आ गई है। एक यूजर ने तंज कसा कि “मंत्री जी का फोन नहीं, हॉटलाइन टू गजबपुर है… जहाँ बातचीत नहीं होती, सीधी धमकी डिलीवर होती है।” वहीं, राजनीतिक तापमान गरम होने के साथ ही विपक्ष ने इस व्यवहार को गुंडागर्दी जैसा बताया है और सवाल उठाया है कि जिस मंत्री की भाषा ऐसी हो, वह जनता की सेवा कैसे कर सकती है।
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‘Kachravo Karb’ :
स्थानीय नागरिकों की शिकायत है कि चितरंगी क्षेत्र में सड़क, पानी, बिजली, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी मूलभूत समस्याएँ बरसों से जस की तस हैं, लेकिन मंत्री जी के तेवर हर दिन नए रिकॉर्ड बना रहे हैं। लोग पूछ रहे हैं कि “विकास 2G पर है, पर धमकी 5G स्पीड पर क्यों?” वीडियो वायरल होने के बाद भी न मंत्री राधा सिंह की ओर से कोई स्पष्टीकरण आया है और न ही सरकार द्वारा कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया। सरकार की यह चुप्पी विवाद को और गहरा रही है और यह सवाल खड़ा कर रही है कि क्या सत्ता की जिम्मेदारी मिलने के बाद जनप्रतिनिधि लोकतांत्रिक मर्यादाओं का पालन करने को बाध्य नहीं हैं।













