Jashpur Fake Encounter Case : गौरी शंकर गुप्ता/बिलासपुर/जशपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने जशपुर जिले के दो दशक पुराने एक रोंगटे खड़े कर देने वाले मामले में न्याय की मशाल जलाई है। एक निर्दोष ग्रामीण को ‘नक्सली’ बताकर मौत के घाट उतारने वाले पुलिसिया तंत्र की पोल खुलने के 24 साल बाद, अब मृतक की विधवा को मुआवजे की आस जगी है। जस्टिस नरेश कुमार चंद्रवंशी की एकल पीठ ने जशपुर कलेक्टर को इस मामले में 45 दिनों के भीतर निर्णय लेने का कड़ा निर्देश दिया है।
नक्सली नहीं, निर्दोष था रामनाथ; अदालत में बेनकाब हुई ‘खाकी’
यह मामला केवल एक एनकाउंटर का नहीं, बल्कि वर्दी की आड़ में छिपे अपराध का है। याचिकाकर्ता श्रीमती संझो बाई के अनुसार, उनके पति रामनाथ राम (नागवंशी) को कांसबेल पुलिस ने एक ‘फर्जी मुठभेड़’ में मार गिराया था।
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पुलिस का दावा: पुलिस ने रामनाथ को खूंखार नक्सली बताकर मुठभेड़ की कहानी रची थी।
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न्यायिक जांच का सच: जांच में पुलिस का यह सफेद झूठ पूरी तरह बेनकाब हो गया। यह साबित हुआ कि रामनाथ एक साधारण ग्रामीण थे, नक्सली नहीं।
ऐतिहासिक फैसला: तत्कालीन SHO सहित 5 पुलिसकर्मी हुए थे दोषी
इस मामले की गंभीरता को देखते हुए सत्र न्यायालय ने 11 जून 2002 को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया था, जिसमें दोषी पुलिसकर्मियों को सजा दी गई:
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तत्कालीन थाना प्रभारी (SHO) एच.आर. अहिरवार: धारा 304-1 (गैर-इरादतन हत्या) के तहत दोषी करार।
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5 अन्य पुलिसकर्मी: धारा 323/34 के तहत सजा सुनाई गई।
सिस्टम की सुस्ती: दोषियों को सजा मिली, पर पीड़ित परिवार को नहीं मिला हक
दोषियों को जेल भेजने के बावजूद, सरकार और प्रशासन ने पीड़ित परिवार की सुध नहीं ली। पति को खोने के बाद संझो बाई पिछले 24 सालों से मुआवजे के लिए दर-दर भटक रही हैं।
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सितंबर 2024: पीड़िता ने जशपुर कलेक्टर को आवेदन दिया, लेकिन प्रशासन की फाइलों में वह आवेदन धूल फांकता रहा।
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हाईकोर्ट की शरण: थक-हारकर महिला ने बिलासपुर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
हाईकोर्ट का ‘डेडलाइन’ आदेश
हाईकोर्ट ने इस प्रशासनिक देरी पर नाराजगी जताते हुए स्पष्ट आदेश दिया है:
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45 दिन की समय सीमा: जशपुर कलेक्टर को याचिकाकर्ता के लंबित आवेदन पर अगले 45 दिनों के भीतर अनिवार्य रूप से फैसला लेना होगा।
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प्रक्रिया: याचिकाकर्ता को 15 दिनों के भीतर पुनः आवेदन और हाईकोर्ट के आदेश की प्रति कलेक्टर कार्यालय में जमा करने की छूट दी गई है।











