Jabalpur Court Decision: जबलपुर। मध्य प्रदेश के जबलपुर जिला एवं सत्र न्यायालय ने आपराधिक मुकदमों में विधिक सजा और त्वरित निर्णय से बचने के लिए आरोपियों द्वारा अपनाए जाने वाले ‘केस ट्रांसफर’ के पारंपरिक हथकंडों पर एक बेहद कड़ा और कस्टमाइज्ड विधिक प्रहार किया है। माननीय सत्र न्यायालय ने थाना माढ़ोताल के अंतर्गत दर्ज धोखाधड़ी और जालसाजी के एक बहुचर्चित दांडिक प्रकरण में मुख्य आरोपी राजेश कुमार अवस्थी (निवासी: दीक्षितपुरा) द्वारा दायर उस कस्टमाइज्ड आवेदन को पूरी तरह खारिज कर दिया है, जिसमें उसने पीठासीन मजिस्ट्रेट पर पूर्वाग्रह का विधिक आरोप लगाते हुए केस को किसी दूसरे न्यायालय में स्थानांतरित करने की गुहार लगाई थी। माननीय सत्र न्यायाधीश ने सख्त विधिक टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया कि किसी न्यायिक अधिकारी द्वारा कानून के दायरे में दिए गए कड़े विधिक आदेशों से नाराज होकर कोई भी आरोपी अपनी पसंद की अदालत चुनने या न्यायिक प्रक्रिया को विधिक रूप से बाधित करने का अधिकारी नहीं हो सकता।

क्या था पूरा विवाद? मजिस्ट्रेट द्वारा स्वतः संज्ञान लेकर बैंक खाते सील करने पर आपत्ति
इस विधिक मामले की कस्टमाइज्ड पृष्ठभूमि के अनुसार, आरोपी राजेश कुमार अवस्थी, उसकी बहन रश्मि अवस्थी और मां गीता अवस्थी के खिलाफ माढ़ोताल पुलिस ने जालसाजी का आपराधिक मुकदमा दर्ज किया था, जिसका विधिक विचारण (Trial) न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (JMFC) श्री डी.पी. सूत्रकार के न्यायालय में प्रगति पर है।
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अंतरिम विधिक कार्रवाई: विचारण के दौरान जब मजिस्ट्रेट ने विधिक साक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए आरोपियों के बैंक खातों को सील (Freeze) करने का कड़ा अंतरिम विधिक आदेश पारित किया, तो आरोपी पक्ष ने सत्र न्यायालय में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 448 के तहत केस ट्रांसफर की अर्जी लगा दी।
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पूर्वाग्रह का आरोप: आरोपी के वकील की दलील थी कि जज साहब ने बिना किसी आवेदन के स्वतः संज्ञान लेकर यह दंडात्मक कार्रवाई की है, जो शिकायतकर्ता पक्ष (सुभाष चंद्र केसरवानी) के प्रति उनके विधिक झुकाव और पूर्वाग्रह को प्रदर्शित करती है। अतः इस अदालत से उन्हें निष्पक्ष न्याय की उम्मीद नहीं है। जब सत्र न्यायालय ने इस पर संबंधित मजिस्ट्रेट श्री डी.पी. सूत्रकार से विधिक टीप (टिप्पणी) मांगी, तो उन्होंने आरोपी के इन सभी दावों को पूरी तरह मनगढ़ंत, असत्य और आधारहीन विधिक करार दिया।
बीएनएसएस की धारा 107 का विधिक सच; बिना आवेदन भी संपत्ति कुर्क करने का अधिकार
सत्र न्यायालय की सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता सुभाष चंद्र केसरवानी के विद्वान अधिवक्ता आदर्श सिंह चौहान ने आरोपी पक्ष के दावों पर कड़ा विधिक पलटवार किया। उन्होंने अदालत के समक्ष भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 107 के विधिक प्रावधानों की व्याख्या करते हुए निम्नलिखित अकाट्य तर्क प्रस्तुत किए:
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स्वतः संज्ञान की विधिक शक्ति: धारा 107 के तहत यदि सक्षम न्यायालय को प्राप्त साक्ष्यों के आधार पर यह दृढ़ विश्वास हो जाता है कि कोई विशिष्ट संपत्ति या धन ‘अपराध की आय’ (Proceeds of Crime) से अर्जित की गई है, तो अदालत को बिना किसी बाहरी आवेदन के भी प्रभावित व्यक्ति को 14 दिनों के भीतर विधिक स्पष्टीकरण देने का नोटिस जारी करने का पूर्ण विधिक क्षेत्राधिकार प्राप्त है।
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एकतरफा अंतरिम आदेश: यदि न्यायालय को यह आशंका हो कि अग्रिम विधिक नोटिस जारी करने से कुर्की या जब्ती का मुख्य उद्देश्य ही विफल हो जाएगा, तो कानूनन मजिस्ट्रेट बिना कोई नोटिस दिए सीधे अंतरिम कुर्की या बैंक खातों को फ्रीज करने का एकतरफा अंतरिम विधिक आदेश पारित कर सकता है।
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तथ्य छिपाने का प्रयास: अधिवक्ता चौहान ने साक्ष्य प्रस्तुत किया कि आरोपी राजेश अवस्थी माननीय सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) तक से सिविल मुकदमा हार चुका है, इसके बावजूद उसने विवादित संपत्ति को अवैध रूप से बेचकर विधिक जालसाजी की। आरोपी केवल इस विधिक क्रिमिनल ट्रायल को लंबा खींचने और अंतिम फैसले को लटकाने के उद्देश्य से यह सारहीन आवेदन लेकर आया है।
काल्पनिक आशंकाओं पर नहीं बदलेंगे जज; सत्र न्यायाधीश कृष्णमूर्ति मिश्र का कड़ा विधिक संदेश
दोनों पक्षों की कस्टमाइज्ड दलीलों को विस्तार से सुनने के बाद, माननीय सत्र न्यायाधीश श्री कृष्णमूर्ति मिश्र ने आरोपी की ट्रांसफर अर्जी को सिरे से खारिज करते हुए एक अत्यंत महत्वपूर्ण विधिक सिद्धांत प्रतिपादित किया। उन्होंने अपने फैसले में माननीय उच्चतम न्यायालय के सुप्रसिद्ध विधिक दृष्टांत ‘उस्मान गनी अदमभाई वहोरा बनाम गुजरात राज्य (2016)’ का विशेष रूप से उल्लेख किया।
न्यायालय का अंतिम विधिक निष्कर्ष: सत्र न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से कहा कि— “यह विधिक रूप से सर्वमान्य सिद्धांत है कि न्याय सिर्फ होना नहीं चाहिए, बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए; परंतु इसका तात्पर्य यह कतई नहीं निकाला जा सकता कि कोई भी आरोपी अपनी व्यक्तिगत कल्पनाओं, मनगढ़ंत आशंकाओं या असंतोष के आधार पर जजों को बदलने की मांग करने लगे। केस ट्रांसफर का आदेश कोई रूटीन प्रक्रिया नहीं है, जिसे सामान्य प्रशासनिक तरीके से जारी कर दिया जाए। इसके लिए न्याय की विफलता (Failure of Justice) की वास्तविक और युक्तियुक्त विधिक आशंका का साक्ष्य विद्यमान होना अनिवार्य है। यदि आरोपी कानूनी और न्यायसंगत आदेशों से नाराज होकर अदालतें बदलने लगेंगे, तो इससे पूरी न्यायपालिका की विधिक विश्वसनीयता और स्वतंत्रता ही समाप्त हो जाएगी।”
इस कड़े और कस्टमाइज्ड विधिक निर्णय के बाद आरोपी राजेश अवस्थी की केस ट्रांसफर की अर्जी पूरी तरह निष्प्रभावी हो गई है। इसके साथ ही, अब माढ़ोताल पुलिस द्वारा दर्ज धोखाधड़ी और जालसाजी के इस मुख्य क्रिमिनल केस की विधिक सुनवाई उसी मजिस्ट्रेट की अदालत में अत्यंत तीव्र गति से आगे बढ़ेगी, जिससे पीड़ित पक्ष को समय सीमा के भीतर त्वरित विधिक न्याय मिलना सुनिश्चित हो सकेगा।









